Friday, 29 September 2017

september 2017

आपत्ति- प्रत्येक धर्म मज़हब ने अपने-अपने सन्देश वाहक, पैगम्बर या संस्थापक को आखरी कहा है। हद यह है कि अनीश्वरवादी, जैन धर्म व बौद्ध धर्म में भी अपने तीर्थकर व बुद्ध को अन्तिम बताकर आगे के लिऐ तीर्थकरत्व व बौद्ध का दरवाजा बन्द कर दिया।

उत्तर- न केवल यह कि इस्लाम के मूल तत्वों के विषय में आपको अभी और अधिक जानकारी की आवश्यकता है, बल्कि अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी आपकी जानकारी में कमी है। खूब समझ लीजिए कि हज़रत मुहम्मद स0 साहब इस्लाम के संस्थापक हरगिज नही थे। उन्होंने पूरे जीवन में कभी यह दावा नही किया कि वह कोई नया धर्म प्रस्तुत कर रहे हैं। कुरआन ने कभी किसी एक स्थान पर भी यह नहीं कहा कि हजरत मुहम्म स0 के द्वारा ईश्वर किसी नये धर्म की स्थापना कर रहा है। पृथ्वी पर इस्लाम धर्म के पहले पैगम्बर हज़रत आदम अ0 थे जो संसार के पहले इन्सान थे। कुरआन की शिक्षा के अनुसार जब-जब संसार में बिगाड़ पैदा हुए और मानव, इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं से हटे तो ईश्वर ने अपने सन्देशवाहक, मार्ग दर्शन हेतु संसार में भेजे। ईश दूतत्व के इसी क्रम में अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 थे जो किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उसी धर्म को जीवित करने हेतु पधारे थे जिसकी शिक्षाओं को लोगों ने बिगाड़ दिया था। इसी प्रकार हजरत ईसा अ0 भी किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उनसे पूर्व जो बिगाड़ आ गया था उसको सुधारने हेतु पधारे। वर्तमान मत्ती की इन्जील (15ः18ः19) इसकी साक्षी है कि हज़रत ईसा अ0 ने तौरेत के अनुसार, जो उनसे पिछला ग्रन्थ था, आचरण करने का आदेश दिया था। बुद्धमत के अनुसार गौतमबुद्ध पहले बुद्ध न थे अर्थात वह भी बुद्धमत के संस्थापक नही थे। श्री महावीर पहले तीर्थकर नही वरन् उनके अनुसार उनका धर्म वही था जो पहले तीर्थकर ऋषभ देव जी का था और वैदिक धर्म का मामला तो बिल्कुल स्पष्ट है। यद्यपि पहले दूत का नाम वहां गुम हो चुका है परन्तु बाद में आने वाले बहुत से व्यक्तियों को हिन्दु धर्म का स्तम्भ माना जाता है। इस प्रकार पहले तो आप यह शंका दूर कर लें कि हर धर्म ने अपने संस्थापक को अन्तिम संदेशवाहक माना है। (असल में संदेशवाक के लिए संस्थापक शब्द ही गलत है। धर्म का संस्थापक ईश्वर है न कि मानव ईशदूत ईश्वरीय धर्म को स्थापित करने के लिये आते थे)।
अब आईये आपत्ति के दूसरे अंश की ओर और वह यह है कि हर धर्म ने अपने किसी संदेश वाहक को अन्तिम माना है आपका यह दावा भी भ्रम पर आधारित है। सबसे पहले वैदिक धर्म को लें -वेदों ने अपने एक महान दूत क ानाम ‘अग्नि’ बताया था, हम अग्नि को दूत (पैगम्बर) चुनते है।’ (़ऋग्वेद 1ः12ः1) 7 जुलाई 1990 के सहकारी युग में डा0 ऋषि चतुर्वेदी ने इस मंत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अग्नि’ इस मंत्र में किसी मनुष्य को नही बल्कि आग को ही अलंकारिक रूप में दूत कहा गया है। ऐसा नही है, बल्कि ऋग्वेद (1ः31ः15) में साफ साफा अग्नि को ‘नर’ अर्थात ‘मनुष्य’ बताया गया है फिर ऋग्वेद (3ः29ः11) में कहा गया है कि अग्नि का नाम ‘नराशंस’ है। वह ‘नराशंस’ नाम से ही संसार मे आयेगा। शब्द ‘नराशंस’ का अनुवाद ‘प्रशंसा’ योग्य मनुष्य अथवा ‘मोहम्मद’ होता है। फिर अथर्ववेद (20ः127ः1) में साफ साफ कह दिया गया कि नराशंस के आने पर उनकी बहुत प्रशंसा होगी, ऊंट उनकी सवारी होगी, उनकी कई पत्नियां होंगी। फिर उस समय के मक्के की जनसंख्या 60,090 होना, अलंकृत भाषा में हब्शा (इथोपिया) देश में शरण लेने वालों की संख्या 100 होना, 10 जन्नती सत्संगिंयों (अशरा मुबश्शिरा) का संकेत, बंदर के युद्ध में विजयी होकर लौटने वालों की संख्या 300 तथा मक्के की विजय के समय इस्लामी सेना की संख्या 10,000 होने का भी वर्णन किया गया है। वेद मन्त्रों का यह अनुवाद प्राचीन अनुवादकों पण्डित राजाराम और पण्डित खेमखरण के अनुवादों पर आधारित है। वर्तमान में चण्दीगढ़ विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर पण्डित वेद प्रकाश उपाध्याय ने यह सारी व्याख्यायें बहुत स्पष्ट शब्दो में लिखी हैं। श्री ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने हमारे इस अनुवाद को अस्वीकार करते हुए अनुवाद लिखा है वह शब्दो का ऐसा वागजाल है जिसका कोई अर्थ नही निकलता। इस प्रकार आप देखें कि दूत ने अपने अवतरण काल कें बहुत बाद नराशंस नाम के एक दूत के आने की भविष्यवाणी की थी और देव लाने वाले अज्ञात ऋषि को अन्तिम नहीं कहा गया था। गीता (4ः7) और श्रीमद् भागवत महापुराण (9ः24ः56) में यह धारणा अंकित है कि जब जब पृथ्वी पर धर्म में बिगाड़ पैदा हो जाता है तथा दुष्कर्म बढ़ जाते है। तब अवतार संसार में आते हैं (पौराणिक काल के ग्रन्थों में दूत के बजाये अवतार की धारणा है)।

यदूदियों की मौजूदा तौरेत और ईसाईयों की वर्तमान इन्जीलों में भी हज़रत मूसा और हज़रत ईसा को अन्तिम दूत नही कहा गया है। दोनांे में स्पष्ट रूप से बाद  के किसी काल में आने वाले एक दूत को आने के संकेत दिये गये हैं इन्जील में इसको फारक़लीत (च्ंतंबसमजम व िच्मतपबसलजवे) कहा गया है। जिसका अनुवाद है ‘प्रशंसा योग्य’ अथवा ‘मुहम्मद’। तौरेत व इन्जली के उदाहरण आपने विस्तार से मेरी पुस्तक ‘कितने दूर कितने पास’ में देखें होंगे। इसलिये तफसीलात छोड़ रहा हंू। हालंाकि वेदों के दृष्टांत भी उक्त पुस्तक में हैं परन्तु क्योंकि डा0 ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने इस पर आपत्तियां की थीं अतः संक्षेप में ऊपर उसका पुनरोल्लेख कर दिया है। गौतम बुद्ध ने भी स्वयं को अन्तिम ‘बुद्ध’ नही कहा था। जब बुद्ध के शिष्य ‘आनन्द’ ने प्रश्न किया, ‘आपके जाने के बाद कौन मार्ग-दर्शन करेगा’ ? बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘मैं पृथ्वी पर आने वाला न तो पहला बुद्ध हंू और न अन्तिम हंूगा। अपने समय में पृथ्वी पर एक पहला बुद्ध आयेगा वह पवित्र, अति बुद्धिमानी होगा। शुभ सृष्टि का ज्ञाता, मानव जाति का अद्वितीय नेता, फरिश्तों और अनितय मनुष्यों का गुरू होगा। मैं ने तुम्हें जो सत्य बातें बताई हैं वह तुम्हें बतायेगा। वह ऐसे धर्म का प्रचार करेगा जिसका प्रारम्भ भी उज्जवल होगा। वह ऐसा धार्मिक जीवन व्यतीत करेगा जो पूर्ण व पवित्र होगा, जैसा कि मेरा ढंग है। उसके शिष्य हजारों होंगे जबकि मेरे सैंकड़ो ही है। आनन्द ने पूछा, ’हम उसे कैसे पहचानें ? बुद्ध ने उत्तर दिया ‘वह मैत्रेय (अर्थात कृपालु) के नाम  जाना जायेगा।
आप विचार करें कि गौतम बुद्ध ने भी अपने आपको अन्तिम नही कहा बल्कि बाद के किसी काल में आने वाले मैत्रेय (कृपालु) की भविष्यवाणी की थी। यह और सुन लें कि कुरआन मंे हज़रत मुहम्मद स0 को ‘रहमतुल्लिल आलमीन’ (सभी संसारों के लिए कृपा सुत्रधार) कहा गया है। पारसियों के दूत जरथुस्त्र के विषय में उनके पवित्र ग्रन्थ ‘अवेस्ता’ में लिखा है कि ईश्वर ने कहा, ‘जैसे जरथुस्त्र के मार्ग पर चल कर उसके अनुयायी वैभव की चोटी पर पहंुचे इसी तरह भविष्य में एक समय में ईश्वर को मानने वाली एक जाति होगी जो संसार और उसके धर्मो को एक नया जीवन प्रदान करेगी और जो दूत की सहायता के लिये खतरनाक युद्धों में खड़ी होगी।’ आगे इस दूत का नाम बताते हुए कहा -‘जिसका नाम विजयी स्वेशियान्ट (ैवमेीरलंदज) होगा और जिसका नाम ‘आस्तवत ईरेटा‘ (।ेजअंज म्तमजं) होगा वह स्वेशियान्ट (कृपा) होगा क्योंकि समस्त संसार को उससे लाभ पहंुचेगा और आस्तवत ईरेटा (जगाने वाला) होगा क्योंकि जीवित मनुष्यों के रूप में वह मनुष्यों को उस विनाश के विरूद्ध खड़ा होगा जो मूर्ति पूजकों और मजदानियों की बुराईयों से फैलेगा। (थ्ंतअंकतपद ल्ंेीजए 25.29ए फनवजमक इल ।ण्भ्ण् टपकीलंतजीप  पद डवींउउंक पद च्ंतेप ैबतपचजनतमे च्रू18 ।) इस्लाम में अन्तिम दूत की धारणा के अतिरिक्त तमाम धर्मों में केवल जैन धर्म के अनुयायी यह धारणा रखते हैं कि श्री महावीर अन्तिम तीर्थकर थे परन्तु वहां भी यह दावा केवल जैनियों का है, स्वयं श्री महावीर के अपने शब्दों में उनके अन्तिम होने का दावा हमें नही मिलता।
इस्लाम संसार का ऐसा एक मात्र धर्म है जिसको पूर्ण करने वाले हज़रत मुहम्मद स0 ने अन्तिम दूत होने की घोषणा की। आप उन्हें ईश्वर का अन्तिम दूत मानें या न मानें, परन्तु यह हरगिज नही कहा जा सकता कि हर संदेशवाहक ने अन्तिम संदेष्टा होने की घोषणा की थी।







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