Thursday, 27 July 2017

जुलाई 2017 अंक

जुलाई 2017 अंक

ं आपत्ति- ऐटमबम, हाईड्रोजन बम, आदि चमत्कारपूर्ण आविष्कारों व उपलब्धियों के बारे में, जिन्हें मानव जीवन की व पृथ्वी की काया पलट दी है (वेद, तौरते, इन्जील व कुरआन आदि में) एक भी शब्द नही मिलता, न उनमें हाल ही में हुए भयंकर विश्व युद्धों को कोई संकेत है।


उत्तर- जैसा मैं ने प्रारम्भ में कहा था कि मैं अपने आपको कुरआन पर आप द्वारा दी गई आपत्तियों के उत्तरों तक सीमित रखूंगा क्योंकि आपके लेख का असल निशाना वही है -कुरआन में अगर आप ऐटमबम, हाईड्रोजन बम, हीराशिमा या नागासाकी के नाम से तलाश करेंगे तो निश्चय ही निराशा होगी परन्तु मूल संकेत हर वस्तु के मिलते हैं। जब मान मस्तिष्क की पहुंच उस मुकाम तक भी न हुई थी कि मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त भी किसी चीज के जोडे़ हो सकते हैं, उस समय कुरआन ने यह नियम दिया था कि पेड़ पौधे ही नही बल्कि निर्जीव वस्तुओं में भी जोड़ों की व्यवस्था होती है। -पवित्र है वह जिसने हर वस्तु के जोड़े बनाये, चाहे वह पृथ्वी की वनस्पति में से हो या स्वयं उनके अपने अस्तित्व (अर्थात मानव जाति) में से या उन वस्तुओे में से जिनको यह (अभी तक) जानते ही नही’ (36ः36)। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक कभी किसी ने कल्पना भी नही कि थी कि प्रत्येक निर्जीव दिखने वाली वस्तु के सबसे सूक्षम कण ऐटम में इलैक्ट्रान और प्रोट्राॅन के जोड़े होते हैं। हर ऐटम के अपने अन्दर निरन्तर गति की एक व्यवस्था होती है। इसका भी संकेत कुरआन ने 1400 वर्ष पूर्व दिया था।
‘पर्वतों को देख कर तुम यह समझते हो कि यह ठोस और स्थिर है जबकि (उनके कण तो) बादलों की तरह उड़ते फिर रहे हैं, यह अल्लाह का चमत्कार है कि (कणों की गति के होने पर भी) उसने हर वस्तु को ठोस व स्थिर कर रखा है। जैसे वह उन उस्तुओं की जानकारी रखता है जिनसे तुम अनभिज्ञ हो, इसी प्रकार जो कुछ तुम करते हो उस सबका भी उसे ज्ञान है।’ (27ः88)। परमाणु शक्ति का प्रयोग भी मनुष्य करेगा और उससे कितना भयंकर विनाश होगा इसका संकेत दे दिया गया था।
’उन लोगों ने बड़े-बड़े षडयन्त्र रचे और उनके दांव अल्लाह के नियन्त्रण में हैं। यद्यपि यह प्रयत्न ऐसे थे कि उनके पर्वत भी उलट जायें’ (14ः46)। ‘क्या वे लोग जो बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते रहते हैं इस बात से निश्चित हो गये हैं कि (उनके इन प्रयासों के फलस्वरूप् उनकी ओर की पृथवी फट जाये) और अल्लाह उन्हें पृथ्वी में समा दे अथवा (उनकी हरकतों के फलस्वरूप) उन पर ऐसी दिशा से प्रकोप आये जिसका उन्हें ज्ञान भी न हो’ (16ः45)। उनके परस्पर युद्ध के फलस्वरूप जिस तरह के विनाश होंगे उनमें धमाकों का वर्णन अब यह किसी भी चीज का प्रतीक्षा नही कर रहे हैं। सिवाये एक भयंकर धमाके के, जो उस वक्त उनको ग्रस्त कर लेगा जब वह लड़ रहे होगे।’ (36ः39)। ऐटमी ताबकारी (रेडियेशन) का धुंआ जब उनको ढक लेता और उससे तड़प-तड़प कर और सिसक-सिसक कर लोग मर रहे होंगे उस समय ही स्थिति का वर्णन ‘तुम उस दिन की प्रतीक्षा करो जिस दिन वायुमण्डल का जाने पहचाने धुंए (ताबकारी-रेडियेशन) से भर जायेगा जो लोगांे पर छा जायेगा। यह बड़ा पीड़ा दायक प्रकोप होगा (फिर लोग प्रार्थना करेंगे कि) हे हमारे रब हमसे इस प्रकोप को दूर कर दीजिए हम ईमान लाते हैं। वह कब सदुपदेश ग्रहण करते हैं। हांलाकि उनके पास ईशदूत आ चुका था फिर ये लोग उससे मुंह मोड़ते रहे और वही कहते रहे कि यह (व्यक्ति) सिखलाया हुआ है, दिवाना है। हम कुछ समय के लिए इस महामारी से हटा लेंगे तो तुम फिर अपनी प्रथम अवस्था पर लौट आओगे।’ (44ः10 से 15)। इन्कार करने वाले आखिर और क्या देखने के बाद आस्था व्यक्त करेंगे ? कुरआन में तो चैदह सौ वर्ष पहले यह भी बता दिया गया था कि इन धमाकों के फलस्वरूप जो विनाश होगा उसके मुजरिम नीली आखों वाले अर्थात पश्चिमी देशों के लोग होंगे जिस दिन शंखनाद होगा। (सूर फूंका जायेगा अर्थात बड़ा भयंकर धमाका होगा), उस दिन जो मुजरिम हमारे समक्ष उपस्थित किये जायेंगे वह नीली आंखो वाले होंगे।’ (20ः102)। दिवाकर साहब, स्वयं निरूपक्ष हो कर विचार कीजिए। क्या यह चैदह सौ वर्ष पूर्व के किसी मनुष्य का कथन है ?




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Tuesday, 13 June 2017

may2017

आपत्ति- भारत और चीन जैसे महान देशों की न किसी किताब का नाम वहां (कुरआन में) दिया गया है और न इन देशों में खुदा के जरिये भेजे गये पैगम्बरों का जिक्र है और इसकी एक वजह है कि मुहम्मद (स0) साहब को जितना मालूम था उन्होंने कह दिया और जितना नही मालूम था उसके बारे में मौन रहे।

उत्तर- भारत मे भेजे गये ईश दूतों और ग्रन्थों का कुरआन पाक में जिक्र है। ईश दूत ह0 नूह (अ0) का वेदों व सनातन धर्म के अन्य मान्य ग्रन्थों में प्रायः (महा जलप्लावन वाले) मनु के नाम से उल्लेख है जबकि भविष्य पुराण में उन का असल नाम ‘न्यूह’ बताया गया हैै। वेदों का कुरआन में ‘आदि ग्रन्थों’ के नाम से उल्लेख है। अगर आप विस्तार से जानने की इच्छा रखते हों तो मेरी लिखी पुस्तक ‘अगर अब भी न जागे तो’ का अध्ययन कर सकते हैं।


आपत्ति- क्या मनुष्य के साथ-साथ खुदा मनुष्य की बनाई हुई भाषा का भी मोहताज हो गया है? ऐसी भाषा का जिसमें प्रायः एक ही शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ लगाये जाते हैं। जिनमें गलत फहमियां होती है जिनमें बहुत सी त्रुटियों होना स्वाभाविक ही नही अनिवार्य भी है, जो नामुकम्मल है, जिसके लेखन व प्रकाशन में आम तौर से गलतियां हो जाती हैं, जिनको सुनकर लिखने में भी गलती होना स्वाभाविक है। फिर यह भी निश्चित है कि सन्देश वाहक या पैगम्बर अपनी भाषा में अपने युग के वातावरण रीति-रिवाज, तत्कालीन सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों व समस्याओं की अपेक्षा से ही समाज व संसार के समक्ष रखेगा जैसा कि कुरआन में वर्णित शरीयत में अन्य विधि व व्यवस्थाओं से स्पष्ट है।

उत्तर- आपके विचार से विपरीत भाषा की इसी सांग्रहिकता मंे ही कुरआन का वह जबरदस्त चमत्कार है जिसे आप अपनी अगली आपत्तियों के उत्तर में देखेंगे। यह कुरआन की भाषा का चमत्कार है कि उसके शब्द हर काल की बुद्धि, विवेक और विज्ञान का साथ देते हैं, और भविष्य में भी देते रहेंगे। यह बात भली भांति समझ लीजिये कि कुरआन विज्ञान, गणित, भुगोल, ज्योतिष या अन्य शास्त्रों की तरह का कोई शास्त्र नही है। यह मूल रूप से मार्ग दर्शन हैं। परन्तु कुरआन के इन्ही सीमित शब्दों में असीमित ज्ञान व आध्यात्म के खजाने छिपे हुए हैं जिनमें से कुछ सामने आ चुके हैं और अन्य रहती दुनिया तक प्रकट होते रहेंगे। अपने इस लेख में आगे आने वाली आपत्तियों में आपने एक विस्तृत सूची प्रस्तुत की है और मालूम किया है आपकी मांग अनुसार सूची से सम्बन्धित वर्णन कुरआन में कहां है। भविष्य में आने वाले समय में इन्कार करने वाले इससे बड़ी सूचियां प्रस्तुत करेंगे जो उन वस्तुओं से सम्बन्धित होंगी जिन्हें आज हक नही जानते। अगर इन सब वस्तुओं के उल्लेख तथा विद्याओं के मूल सिद्धान्तों पर आधारित आप कोई पुस्तक संकलित करना चाहंे तो उसमें इतने कागज की आवश्यकता पडे़गी जिसकी उपलब्धि असम्भव होगी और इतनी मोटी पुस्तक बन जायेगी जिसको पढ़ लेना संसार के किसी भी व्यक्ति के लिये सम्भव न होगा। ईश्वर ने अपना कलाम उन शब्दों में मनुष्यों को दिया कि उन्हीं सीमित शब्दों में हर प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। उदाहरण के लिये कुरआन की जिन आयतों में निहित वैज्ञानिक सिद्धान्तों को मेरे अगले उत्तरों में आप देखेंगे, कुरआन के उन्हीें शब्दों में स्वर्ग-नरक और प्रलय के अर्थ भी निकलते हैं जो न केवल सत्य है वरन् करुआन की खुशखबरियां व चेतावनियों पर आधारित आहवान का मूल उददेश्य हैं। लेकिन उन्हीं शब्दों में संसार में होने वाले धमाकों और पृथ्वी की नैमित्तिक प्रलय का चित्रण और सार्वभौमिक वास्तविकतायंे भी है। रहा प्रश्न इस बात का कि मनुष्य की भाषा में ईश्वर का कलाम रिकार्ड होने से उसमें नक़ल आदि की त्रुटियां होने की आश्ंाका है तो इसके लिये ईश्वर का यह आश्वासन पर्याप्त है। इस अनुस्मृति (त्मउपदकमत) को हमने, हां हमीं ने अवतरित किया है और हम इसकी सुरक्षा करने वाले हैं (15ः9)। और इस दावे को जीता जागता प्रमाण संसार की प्रतियां हैं जिनमें परस्पर एक अक्षर का भी अन्तर नही है। दावे की सत्यता का प्रमाण सामने देखने के पश्चात भी आपत्ति करना कहां तक उचित है।


आपत्ति- कुरआन में बार-बार आसमानों का, सात आसमानों का उल्लेख है पर जमीन या धरती को एकवचन के रूप में कहा गया है और उसकी वजह यह है कि मुहम्मद (स0) साहब को यही ज्ञान था कि बस यह धरती ही कुल संसार और शेष आसमान ही आसमान है।

उत्तर- मैं ने गत एक उत्तर में कहा था कि आपने कुरआन का अध्ययन ध्यान पूर्वक नही किया परन्तु आपकी इस आपत्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि सिरे से अध्ययन किया ही नही और सुनी सुनाई आपत्तियां आपने अपने लेख में उद्धरित कर दी हैं कुरआन की पहल आयत आपकी इस आपत्ति का हल्कापन स्पष्ट करती है। हर प्रकार की प्रशंसा का पात्र अल्लाह ही है। जो समस्त संसारांे का रब है (1ः1)। कुरआन में अल्लाह को ‘पूर्वो और पश्चिमों का रब’ (70ः40)। कहा गया है। आपने अपने लेख मे ब्रहमाण्ड के विस्तार का वर्णन किया है। कुरआन इसे इन शब्दों मे बयान करता है। ‘अगर हम उनके लिये ब्रहमाण्ड में कोई द्वार खोले दें और वह उसमें चढ़ते चले जायें तो वह कहेंगे कि हमारी नजरे मदमयी हो गयी हैं बल्कि हम पर जैसे जादू ही कर दिया गया है। (15ः14ः15)। 1400 वर्ष पूर्व क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता थ कि ‘हमने ब्राहमाण्ड को अपने सामथ्र्य से रचा है और हम इसको फैलाते हैं’ (51ः47)। यह दृष्टिकोण तो आईन्सटाईन की सापेक्षतावाद (ज्ीमवतल व ित्मसंजपअपजल) के बाद प्रस्तुत किया गया है और फिर आधुनिक भौतिक विज्ञान और ज्योतिष के प्रयोगों से यह जानकारी हुई कि सृष्टि लगातार फैलती है और आकाश गंगाएं एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं आपने एकवचन मे ंप्रयोग होने वाले शब्द ‘अर्ज’ का उल्लेख किया है जिसका अनुवाद ‘जमीन’ है। ‘अर्ज’ कुरआन की भाषा में हर नक्षत्र, हर ग्रह या धरती को नही कहते। केवल उस प्रकार की धरती को कहते कि जहां  जीवन के लक्षण हों। नक्षत्रों को ‘नुजूम’ और ग्रहों को ‘कवाकिब’ कहा गया है और इनका उल्लेख कुरआन मे अनेक स्थानों पर है। कुरआन में इस धरती जैसी सात धरतियों का उल्लेख किया गया है। अल्लाह वह है जिसने सात आसमान बनाये और उन्हीें की तरह (सात) धरतियां भी। इन सब में अल्लाह के आदेश अवतरित होते रहते हैं ताकि तुम जान लो कि प्रत्येक वस्तु अल्लाह के सामथ्र्य से परिसीमित है और यह कि अल्लाह हर वस्तु को अपने ज्ञान से घेरे हुए है। (65ः12)। आधुनिक विज्ञान के पास पर्याप्त संकेत आज इस बात के हैं कि इस जैसी अन्य धरतियां ब्रहमाण्ड में है। जहां जीवन पाया जाता है। इनकी संख्या विज्ञान अभी निश्चित नही कर सका है। खोज जारी है जबकि चैदह सौ वर्ष पूर्व कुरआन ने यहां तक बता दिया था कि ब्रहमाण्ड में न केवल अन्य स्थानों पर भी प्राणी हैं बलिक इस धरती पर रहने वालों की एक न एक दिन उनसे भेंट भी होगी। इस घटना को भी ईश्वर ने अपनी निशानियों में से एक निशानी के रूप में प्रस्तुत किया है। और उस (अल्लाह) की निशानियों में से एक यह है कि उसने आकाशों और पृथ्वी को तो उत्पन्न किया ही, इन दोनों में उसने प्राणी फैला रखे है। और वह इनको जब चाहे एकत्रित करने में समर्थ है। (42ः29)। कुरआन ने डेढ़ हजार वर्ष पूर्व बताया कि ब्रहामाण्ड के रहस्य खुलते चले जायेंगे और उसे भी ईश्वर की एक निशानी के रूप में पेश किया था। शीध्र (वह समय आयेगा जब) हम उनको अपनी निशानियां ब्रहामाण्ड में और स्वयं उनके अपने अस्तित्व में दिखायेंग यहां तक कि उन पर स्पष्ट होकर रहेगा कि यह कुरआन सत्य है। (क्या तुम्हारे लिये) तुम्हारे रब का यह गुण पर्याप्त नही कि वह हर वस्तु का (स्वयं) साक्षी है? (41ः53)





 


Saturday, 29 April 2017

अप्रैल2017 अंक

आपत्ति- कुरआन में स्थान पर हज़रत मुहम्मद स0 को ईश्वर दूत न मानने वाले ............को मार डालने और नष्ट कर दने का अहवान और दूसरों को लड़ाने की खुदा की इच्छा का वर्णन है।


उत्तर- ऐसा प्रतीत होता है आप उन लोगों के प्रचार से प्रभावित हो गये हैं जिन्होंने कुरआन मजीद को या तो पूरा नही पढ़ा है या जान बूझ कर कुछ भागों को अनदेखा किया है। पवित्र कुरआन आपके पास हैं यदि आपने ध्यानपूर्वक उसका अध्ययन किया होता तो इतनी भयानक गलतफहमी नही होती। कुरआन तो अपने अनुयायियों से कहता है कि इन्कार करने वालों से कहा दो........तुम्हारे लिये तुम्हारा धर्म, मेरे लिये मेरा धर्म (109ः6) कुरआन का कथन है कि ..धर्म में जबरदस्ती नही की जा सकती। (2ः256)। इन्सानी जान को अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है। कुरआन नेक बन्दों के गुण बयान करते हुए कहता है कि वह उस जान को जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, बिना हक के हलाक नही करते और न बलात्कार करते हैं और जो कोई ऐसा करेगा, किये का दण्ड पायेगा। (25ः68)। यही सिद्धान्त विस्तार से एक दूसरे स्थान पर देखिये....जो किसी की हत्या करे, बिना कि उसने किसी की हत्या की हो अथवा पृथ्वी पर उत्पात किया हो, मानो उसने समस्त मानव जाति की हत्या की और जिसने किसी की जान बचाई, मानो उसने सारे मुनष्यों की रक्षा की। इन लोगों के पास हमारे पैगम्बर स्पष्ट आदेश लेकर आये परन्तु इसके बाद भी इसे अधिकतर ऐसे हैं जो पृथ्वी पर सीमाओं का उल्लघंन कर जाते हैं (5ः32)। युद्ध की आज्ञा कुरआन केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही देता है.......जिन (आस्तिकों) के विरूद्ध युद्ध किया जा रहा है। उन्हें (अपने बचाव में) युद्ध की अनुमति दी जाती है क्यांेकि उन पर अत्याचार हुआ है और ईश्वर उनकी सहायता करने में निसन्देह समर्थ है। यह वो लोग है जो निर्दोष अपने घरों से निकाले गये थे। उनका अपराध केवल यह था कि ये अल्लाह को अपना पालनहार कहते थे। (23ः39,40)।  जब आस्तिकों पर आक्रमण हो तो उत्पात को समाप्त करने क ेलिए युद्ध की अनुमति है लेकिन युद्ध के समय भी सीमाओं का उल्लघंन न करने का आदेश हैं जैसे ही अत्याचारी अपने अत्याचार से रूक जायें और उत्पात से रूक जाने का आश्वासन दें तो युद्ध तुरन्त रोक देने का आदेश है। ...जो लोग उनसे युद्ध करते है। उनके ईश मार्ग में युद्ध करो मगर (युद्ध करने में) सीमाओं का उल्लघंन करो। (अर्थात तुम अत्याचार पर न उतर आओ) क्योंकि ईश्वर सीमा उल्लघंन करने वालों को पंसद नही करता। इन अत्याचारियों को जहां पाओ कत्ल करों और जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला है, वहां से उन्हें निकाल बाहर करों क्यांेकि यह उत्पात हत्या से अधिक बुरा है। तुम उनके निरन्तर युद्ध किये आज यहां तक कि उत्पात बाकी न रहे और दीन केवल ईश्वर के लिये हो। परन्तु अगर वह (उत्पात करने और दीन के विषय में तुम पर जबरदस्ती करने से) रूक जाये तो यह जान लो कि दण्ड अत्याचारियों के सिवा किसी और के लिये नही है। (2ः190, 191,193)। युद्ध का आदेश अथवा अनुमति केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में हे। कुरआन मजीद में युद्ध से सम्बन्धित जितनी आयतें हैं उन्हें भ्रम फैलाने वाले लोग सन्दर्भ से काट देते हैं और केवल वह अंश निकालकर सामने रखते है जहां युद्ध से बचने का आदेश है। यदि वह सन्धि की ओर अग्रसर हों तो तुम भी उनकी ओर झुक जाओ और फिर यदि उनका आया तुमसे विश्वासघात करने का भी होगा तो (तुम इस संभावना पर सन्धि से न हटना) ईश्वर तुम्हारे लिये पर्याप्त है (8ः61,62)। और अगर वह तुम्हें छोड़ रहें और तुमसे झगड़ा न करें और तुम्हारी ओर सन्धि का सन्देश भेजें तो ईश्वर ने उन पर (हाथ उठाने का) तुम्हारे लिये कोई मार्ग नही रखा (4ः90)। आप यह कहते हैं कि मानने वालों को मार डालने और नष्ट करने का आदेश है। इसके विपरीत तुमसे यदि (युद्ध के वातावरण) में मुशरिकीन में से कोई व्यक्ति तुमसे शरण की प्रार्थना करे तो उसको शरण दो यहां तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन समझ ले फिर उसके शान्ति के स्थान पर वापिस पहुंचा दो। ऐसा इस कारण से है कि यह लोग (इस्लाम की) वास्तिविकता से अनभिज्ञ हैं (9ः6)। जब तक युद्ध ज़रूरी न हो जाये कुरआन अपने अनुयायियों को संयम रखने को प्रोत्साहित करता है। विरोधी अगर कष्ट भी पहुंचाये तो बदले की अनुमित होते हुए भी धैर्य रखना उचित है। और यदि तुम लोग बदला लेना चाहते हो तो (अधिक से अधिक) उतना ही बदला जो जितना कष्ट तुम्हें दिया गया है लेकिन अगर धैर्य रखो तो यह संयम रखने वालों के प्रति बहुत उचित है (16ः126)। तुम (विरोधियों की यातनाओं पर) संयम रखो और तुम्हारे धैर्य तो ईश्वर की ही देन है और यह लोग जो (तुम्हारे विरोध में) षडयन्त्र रचते हैं उनसे निराश न हो क्योंकि जो लोग परहेजगारी ग्रहण करते हैं और (जो लोगों के साथ) सद्व्यवहार करते है।, ईश्वर उनका मित्र है (16ः127,128)। कुरआन आस्तिकों को आदेश देता है कि न्याय का पक्ष शत्रुओं के मामले में भी हाथ से न छूटे। हे ईमान वालों, अल्लाह के लिये पूर्ण नियमित एवं न्याय के साक्षी बनो और किसी कौम की शत्रुता तुम्हें इस बात पर मजबूर न कर दे कि तुम भी (उसके साथ) अत्याचार करने लगो। न्याय से काम लो क्योंकि यह परहेजगारी के अत्यन्त समीप है और अल्लाह से डरते रहो (5ः8)। कुरआन ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह लोग जो कुछ (तुम्हारे विषय में) कहते हैं उसे हम खूब जानते है। और तुम उन पर जबरदस्ती करने वाले नही हो। (तुम्हारे कार्य तो यह है कि) जो व्यक्ति हमारे प्रकोप से डरता है उसको कुरआन सुना-सुना कर समझाते रहो। (50ः45)। तुम उपदेश किये जाओ तुम्हारा काम सिर्फ उपदेश देना है। तुम उन पर दरोगा तो नही हो। (88ः21,22)। क्या तुम (इस बात के लिये) लोगों पर जबरदस्ती कर सकते हो कि वह ईमान ले ही आये (10ः99)। (हे ईश दूत) तुम्हारी जिम्मेदारी तो केवल (बात को) पहुंचा देना है और हिसाब लेना हमारी जिम्मेदारी है (13ः40)। बात पहुंचाने के लिये भी नम्रता से बातचीत करने का आदेश दिया गया है। अपने रब से मार्ग की ओर युक्ति से और अच्छे उपदेश से बुलाओं और उनसे सभ्यता से ही तर्क करो (16ः125)। कुरआन की इसी युद्ध व शान्ति सम्बन्धी नीति पर ईशदूत स0 अपने जीवन में पूर्णतया कार्यरत रहे। मक्के से मदीने की दूरी 500 किमी. है लेकिन मक्के से मुशरिकीन (बहुदेव वासियों) से जो तीन युद्ध हुए हैं वह मदीने और उसके आस पास हुए जबकि मक्के के लोगों ने उन पर आक्रमण किया था। मक्के की विजय के अवसर पर उस समय तक मुशरिकीन के सरदार अबूसुफियान के घर शरण लेने वाले हर शत्रु के लिये क्षमा की घोषणा की गयी। जब इस्लामी सैनिक विजेता के रूप में मक्के में प्रवेश कर रहे थे तो सेना के ध्वजारोही ने यह नारा लगाया कि ‘आज रक्तपात का दिन आ गया है’ ईश्दूत स0 का शुभ मुखमण्डल क्रोध से तमतमा उठा। आदेश दिया कि नारा लगाने वाले से ध्वज लेकर चलने का सम्मान छीन लिया जाये और आपने इस्लामी सेना को यह नारा दिया कि ‘आज दया करने का दिन है।’

गत 1400 वर्षीय इतिहास में आज तक इस्लामी बहुसंख्यक देशों में गैर मुस्लिम नागरिक शान्ति से रहते आये हैं। वहां के प्रशासकों ने कभी उनकी गर्दन उड़ाने के आदेश पारित नही किये। दिवाकर साहब, आप भी तो मुस्लिम देशों की यात्रा कर चुके हैं, वहां आपको प्यार मिला या आपकी गर्दन उड़ायी गयी ? डेढ़ हजार साल में संसार के किसी मुस्लिम ज्ञानी या साधारण व्यक्ति को कुरआन में यह उपदेश नही आया कि गैर मुस्लिम की हत्या कर डालो, अब आप उन्हें बताना चाह रहे है कि तुम्हें ईश्वर ने हत्या करने का आदेश दिया है ? कृपया इस ओर ध्यान दें कि आप क्या कह रहे हैं।
कुरआन ने जिन आवश्यक परिस्थितियों में युद्ध की अनुमति दी है मैंने संक्षेप मे आपके समक्ष रख दी है अगर अत्याचार और उत्पात करने वालों से आत्मरक्षा न की जाये तो सम्पूर्ण पृथ्वी अत्याचारियों और आतंकवाद से भर जायेगी। उसकी वकालत आपका जहन करता है तो करे, कुरआन के स्वामी का दृष्टिकोण यह हरगिज नही हो सकता।









Thursday, 30 March 2017

मार्च अंक 2017

                    गवाही          सय्यद अब्दुल्लाह तारिक  


आपत्ति- कुरआन भी कम-ज्यादा इसी (वेद जैसी) श्रेणी में आता है। यह भी नही कहा जा सकता कि यह सम्पूर्ण रूप से मुहम्मद (स0) साहब की रचना है या उसमें जो कुछ है वह मुहम्मद (स0) साहब का यह कहकर कहा हुआ है कि वह खुदा का कलाम है। तत्कालीन अरब में न कागज था न छपाई की व्यवस्था थी। खजूर के पत्तों पर, हड्डियांे पर अथवा झिल्ली के टुकड़ों पर लिखने की प्रथा थी। अतः कुछ तो, बल्कि शायद अधिकतर कुरआन सामग्री इस तरह लिखी गई थी। कुछ जो लोगांे को कन्ठस्थ था उनसे वह सामग्री ली गई खलीफा हज़तर उमर के जमाने में कुरआन की आयातों को संग्रहीत करने की व्यवस्था की गयी। हज़रत अबूबक्र ने यह काम हजरत (जैद) बिन साबित अन्सारी के सुपूर्द किया जो मुहम्मद (स0) साहब के कुछ समकालीन व्यक्तियों के साथ, जिन्हें सहाबा कहा जाता है, इस काम में जुट गये। यह ऐलान किया गया कि जिस किसी को कोई आयत या आयतें मुहम्मद साहब के कहने पर उन्होंने लिखी है वह प्रस्तुत की जायें। यही हुआ भी प्रस्तुति के पक्ष में दो व्यक्तियांे की गवाही ली गई और कुरआन संग्रहीत व पूर्ण किया गया। लोगों की याद्दाश्त पूर्णतया सही हो, यह जरूरी नही है और यही बात गवाही को लेकर है। ऐसे साक्ष्य को अटल व अवाधित मानने को कोई स्वस्थ आधार नही है, क्यांेकि याद्दाश्त बरहाल याददाशत है और गवाही आखिर गवाही है। पूरी सम्भावना यहां इस बात की है कि मुहम्मद (स0) साहब ही नही, उन व्यक्तियों के मन्तव्य भी कुरआन के अन्तर्गत आ गये होंगे जिन्होंने ‘आयते’ प्रस्तुत की थीं। इस तरह कुरआन को भी वेद की तरह एक संग्रहीत ग्रन्थ ही कहा जायेगा अन्तर केवल यह है कि वेद हजारों वर्ष से संग्रहीत हुए और कुरआन कुछ दशब्दियों में ही।

उत्तर- इस सन्दर्भ में आपकी जानकारी में बहुत सी गलतियों का मिश्रण तो है ही, निष्कर्ष निकालने में भी आप निष्पक्ष नही प्रतीत होते।
पहले तो यह संशोधन कर लें कि कुरआन एक ग्रन्थ के रूप में हजरत अबूबक्र रजि0 के शासन काल में संग्रीहत किया गया न कि हज़रत उमर रजि0 के, जैसे कि आपने लिखा है। हज़रत मुहम्मद (स0) साहब के स्वर्गवास के बाद हज़रत अबूबक्र खलीफा चुने गये। वह अपने निधन तक दो वर्षो से कुछ अधिक शासक रहे फिर हज़रत उमर खलीफा हुए। हज़रत उमर के शासन काल मे हज़रत अबूबक्र जीवित ही न थे, उन दोनों का आपसी परामर्श कैसे होता, जैसा कि आपने लिखा है!

अब आईये दुबारा इस वास्तविकता पर कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (स0) साहब के बाद हज़रत अबूबक्र रजि0 नियुक्त हुए और इसके बाद ढाई वर्ष से कम समय संसार में रहे। हजरत उमर रजि0 के परामर्श पर उन्होंने अपने जीवन काल में कुरआन को एक ग्रन्थ के रूप में संग्रहीत करने की व्यवस्था की। द्वितीय शासक हज़तर उमर रजि0 ने इस ग्रन्थ को अपने स्वर्गवास के समय अपनी सुपुत्री व हजरत मुहम्मद (स0) साहब की पत्नी हज़रत हफ़सा र0 के पास रखवा दिया। इस प्रकार कुरआन की प्रथम संकलित और लिखित प्रतिलिपि ईशदूत हज़रत मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के ढाई वर्ष के भीतर सुरक्षित कर ली गयी थी। आप अपनी इस शंका को दूर कर लें कि इसमें कुछ दशब्दियों का समय लगा था।

आपको इस बात का भली-भांति अनुमान होगा कि मुसलमान कुरआन पर आचरण के मामले में कितना ही दिवालिया हो गया हो लेकिन कुरआन व पैगम्बरे-कुरआन से उसकी श्रद्धा इस चरम सीमा तक पहुंची हुई है कि वह उनके किसी प्रकार के अपमान की संभावना को सहन नहीं कर सकता। यह उसे अपने जीवन से भी अधिक प्रिय है। जब 1400 वर्ष पश्चात के अधूरे मुसलमान का यह हाल है तो इस की कल्पना भी नही की जा सकती कि सहाबा (ह0 मुहम्मद स0 के सत्संगी) जान बूझकर कुरआन में अपने कलाम का मिश्रण कर सकते थे। अनजाने में इसकी कितनी गुनजाईश थी, इसका अन्दाजा निम्न से लगायें-

पहले अपनी जानकारी की एक और त्रुटि को सही कर लें। आपने लिखा है कि कुछ या अधिक पुरानी सामग्री विभिन्न चीजों पर लिखी हुई थी और कुछ हिस्से लोगों को कन्ठस्थ थे, जिन्हें एकत्रित करके कुरआन संग्रीहत किया गया। ऐसा नही था, बल्कि तमाम कुरआन हजारो लोगों को कन्ठस्थ था और कुरआन की तमाम सामग्री भी विभिन्न वस्तुओं पर लिखी हुई सहाबा के पास मौजूद थी। ह0 मुहम्मद स0 पर जैसे ही कोई आयत अवतरित होती थी आप उसी समय हस्तलेखियों को बुलाकर लिखवा देते थे फिर उनसे पढ़वाकर सुनते थे ताकि कोई त्रुटि नहीे रह जाये। सहाबा (ह0 मुहम्मद स0 के सहचारी) भी इस भाग को उसी समय कन्ठस्थ कर लेते थे। इस प्रकार लिखित रूप में सम्पूर्ण कुरआन विभिन्न वस्तुओं पर ईशदूत स0 के हस्तलेखियों का लिखा हुआ मौजूद था। बहुत से सहाबा जो कन्ठस्थ करते थे, उसे अपने पास भी लिखकर रख लेते थे। ह0 अबूबक्र र0 ने जब कुरआन एकत्रित किया तो वह तमाम सामग्री एकत्रित की जो हजरत मुहम्मद स0 के हस्तलेखियों ने लिखी थी, दूसरे वह समस्त सामग्री भी एकत्रित की गयी जो सहाबा ने अपने पास लिख रखी थी और तीसरे कुरआन के कंठस्थियों को एकत्रित किया गया। उनमें से भी किसी एक स्रोत पर ही भरोसा नही किया बल्कि सभी कंठस्थ्यिों के सर्वसम्मत होने के पश्चात भी अगर कोई ‘आयत’ लिखे हुऐ रूप में उसी समय प्राप्त नही हुई तो उसकी उस समय तक तलाश की गई जब तक वह आयत किसी सहाबा के पास लिखित रूप में नही मिल गयी। इस प्रकार इन तीनों स्रोतों के आपसी पुष्टि और क्रास चैकिंग (ब्तवे बीमबापदहद्ध से यह प्रमाणित ग्रन्थ संग्रहीत हुआ जो हजरत अबूबक्र रजि0 से द्वितीय खलीफा (शासक) हजरत उमर रजि0 को हस्तान्तरित हुआ और जिसे फिर उन्होंने अपने स्वर्गवास के समय अपनी पुत्री हजरत हफ़सा के पास रखवा दिया था। तृतीय खलीफा हजरत उस्मान रजि0 ने उसकी 6 प्रतिलिपियां तैयार करवा कर विभिन्न स्थानों पर भेज दीं। इस पूरी कार्यवाही के समय ह0 मुहम्मद स0 के हस्तलेखी जिनको ईश्वर के दूत ने कुरआन बोलकर लिखवाया था, उपस्थित रहे। अब आप बतायें कि कौन सी गुंजाइश किसी एक शब्द के रददोबदल की भी बाकी रह जाती है ? क्या इस तिहरी क्रास चैकिंग को जिसमें कोई एक कंठस्थी नही बल्कि बड़ी संख्या में कंठस्थी शामिल थे, और जो ह0 मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के केवल ढाई वर्ष के अन्तराल के अन्दर हुई थी, आप अप्रमाणित कह सकते है ? क्या ऐसे प्रमाण को अटल मानने का कोई स्वस्थ आधार नही है ? अगर है तो फिर आखिर किस चीज को आप गवाही कहते हैं
इसके अतिरिक्त किसी सहाबी (सहचारी) का कलाम कुरआन में शामिल हो जाना तो दूर, स्वयं हजरत मुहम्मद स0 ने अपने शब्दों (जिन्हें हदीस कहते हैं) और कुरआन की वर्णनशैली में इतना स्पष्ट अन्तर है कि अरबी भाषा का साधारण विद्यार्थी भी उसे पहचान सकता है। कुरआन और हदीस की शैली का यह अन्तर इतना स्पष्ट है कि अनुवादों मंे भी पहचाना जा सकता है।

आप लिखते है कि ‘लोगों की याददाश्त पूर्णतया सही हो यह ज़रूरी नही है’। अपनी जानकारी के लिए सुन लें कि स्मरण शक्ति की भी लगातार परीक्षा होती रहती थी और यह परीक्षा आज तक जारी है। प्रतिदिन पांच समय की नमाज़ में कुरआन का कुछ भाग पढ़ना आवश्यक होेता है और वर्ष में एक बार रमज़ान के महीने में हर मस्जिद में एक कंठस्थी तरावीह की नमाज में पूरा कुरआन खत्म करता और दूसरे कंठस्थी उसको सुनते हैं। हजरत मुहम्मद स0 ने अपने स्वर्गवास से पूर्व रमज़ान के महीने में दो बार कुरआन सुनाया। उसी का यह परिणाम है कि आज संसार के हर उस भाग में जहां मुसलमान थोड़ी सी संख्या में आबाद हैं, वहां कुरआन के कंठस्थी मौजूद हैं और तजुर्बा किया जा सकता है कि संसार के दूर-दूर के भागों से विभिन्न कंठस्थियों को यदि एकत्रित करके कुरआन सुना जाये तो कोई अन्तर न होगा। यही हाल कुरआन के हस्तलिखित तथा छपी हुई प्रतियों का है। इस्लामी शासन के तीसरे खलीफा हजरत उसमान रजि0 ने जो हजरतर मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के 12 वर्ष बाद खलीफा हुए, उनके विभिन्न देशों में भेजे हुए कुरआन की 6 हस्तलिपियों में से दो प्रतियां ताशकन्द और इस्तम्बोल के संग्राहलयों में आज भी मौजूद हैं। इन प्रतियों और संसार के किसी काल के और किसी क्षेत्र के छपे हुए कुरआन में एक अक्षर का भी अन्तर नही है। कभी अगर कुरआन की छपाई में अत्याधिक सतर्कता के पश्चात भी छपाई की गलती होतीहै तो वह तुरन्त पकड़ ली जाती है क्योंकि संासर के हर क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में कंठस्थी मौजूद हैं। जिनकी संख्या लाखों से भी अधिक है। यही कारण है कि अत्यन्त पक्षपाती कुछ लेखकों को छोड़ कर यूरोपीय इतिहासकारों की अधिक संख्या इस बात को मानती है कि संसार में आज जो कुरआन मौजूद है उसका एक-एक अक्षर वही है जिसके हजरत मुहम्मद स0 ने ईश्वरीय ग्रन्थ होने का दावा किया था।              







Wednesday, 1 March 2017

फरवरी 2017 epaper

आपत्तिः
आखिर वह विषेष व्यक्ति या पैग़म्बर दूसरों से कहेगा वह उसकी सुनी हुई बात होगी जो अन्य सबके लिए सुने हुये(hear -say ) के दर्जे का ही अप्रमाणित साक्ष्य होगा। वह सन्देष वेदों के लिए खुदा का कहा हुआ नही बल्कि उस विषेष व्यक्ति का कहा हुआ ही होगा जो यह कहता है कि ईष्वर या खुदा ने उससे ऐसा कहा था। ऐसी गवाही कानून की नज़र में घटिया गवाही है। क्या ज़मानत है इस बात की कि मुहम्मद साहब खुदा के पैग़म्बर है? केवल मुहम्मद साहब का अपना ब्यान, बु़िद्ध विवेक की नज़़रों में ठोस सबूत नही माना जा सकता। किसी ने न फ़रिष्ते आते हुये और मुहम्मद साहब को आयतें सुनाते या पैगा़म देते देखे, न अन्य कोई प्रमाण है इस श्रद्धा-जन्य धारणा के पक्ष में। 

उत्तर- जहाँ तक कानूनी प्रमाण का सम्बन्ध है, प्रमाण तो उस दषा में भी नही हो सकता जिसका आपने प्रस्ताव रखा है। एक व्यक्ति कहता है कि मेरे मन में ईष्वर ने यह डाला है कि गरीबों की सहायता करों, दूसरा यह कह सकता था कि नही, ईष्वर की इच्छा है कि हर कोई अपनी मेहनत की कमाई खाये, दूसरों को दान देकर उसे निकम्मा न बनाये। क्या प्रमाण होता है इस बात का कि पहला व्यक्ति ठीक कह रहा था सिवाये इसके कि दूसरा व्यक्ति अपने मन में यह मानता कि प्रथम व्यक्ति सच्चा था? लेकिन मन के अन्दर से किसी सच्चाई को स्वीकार करने के बाद कोई ज़बान से इन्कार करे तो प्रमाण की आवष्यकता होती है। इसे ही कानूनी प्रमाण कहते है। कातिल जब कत्ल से इन्कार करता है तो वह अपने मन मंे यह जानता है कि वह झूठा है न्याय प्रमाण चाहता है। कानून की षब्दावली में एक चीज़ होती है परिस्थिति मूलक साक्ष्य(circumstaintial evidence )।

अब देखियें! मानव इतिहास के सबसे अन्धकारमय युग मंे अपने समय की सबसे अधिक भटकी हुई कौ़म में एक बच्चा पैदा होता है। अपनी आयु की 40 मन्ज़िलें तय करने तक किसी एक भी छोटी से छोटी बुराई में षामिल नही होता। उसने 40 वर्ष में कभी कोई झूठ नही बोला, कभी किसी को धोखा नही दिया, कभी किसी का दिल नही दुखाया, कभी किसी का अधिकार हनन नही किया, कभी किसी अमानत में हैराफेरी नही की। उसकी कौ़म उसको ’अल-अमीन’ (धरोहरधारी) और ’ उस्सादिक’(सदा सत्यवादी) की उपाधि देती है।

वह 40 वर्ष की आयु में अचानक यह घोषणा करता है कि ईष्वर ने उसको दूत बनाया है। उसने खुदाई का दावा नही किया,ईष्वर का पुत्र होने का दावा नी किया बल्कि अपने आपको, ईष्वर का बन्दा व दास कहा और यह कहा कि ईष्वर ने मनुष्य के मार्ग- दर्षन के लिये उसके पास सन्देष भेजा है। इस घोषणा के बाद वह जो कौ़म की आँखो का तारा था, उनके क्रोध का पात्र हो गया। उसके आहवान से उनकी सभी आस्थाओं व कुकर्मो के महल टूट रह थे। उसके सामने प्रस्ताव रखा गया कि वह चाहे तो उसको कौ़म का सरदार बना दिया जाये। वह ज़बान से निकाले तो अरब की सुन्दर से सुन्दर युवतियाँ उसके चरणों में डाल दी जायंे। वह कहे तो उसके टूटे फूटे घर पर धन का ढेर लगा दिय जाये, लेकिन वह अपने धर्म प्रचार से बाज़ आजाये। उसके बूढे संरक्षक चाचा से उस पर जो़र डलवाया गया तो वह व्यक्ति उत्तर देता है कि ’’खुदा की क़सम चाचा जी, अगर यह लोग मेरे एक हाथ पर सुर्य और एक हाथ पर चन्द्रमा भी लाकर रख दें तब भी अपने सन्देश  से विचलित नही हो सकता’’।

उसके और उसके साथियों पर अत्याचार व दमन का दौर शूरू होता है। ढाई वर्ष तक उसकी और उसके परिवार वालों की ऐसी आर्थिक नाकाबन्दी होती है कि वृक्षों की छालें खा-खाकर गुजारा होता है मगर वह कहता है कि वह तो ईशदूत  है और ईश्वर  के सन्देष से हटना उसके लिए संभव नही है। उसके साथियों को अरब की जलती रेत पर नंगे रीर लिटाकर गले में रस्सी डाल कर खींचा जाता है। उसके मानने वालों को चटाई में लपेट कर धुऐं की धूनी दी जाती है। उसके आहवान का समर्थन करने वालो को नंगी पीठ अंगारों पर लिटाकर सीने पर भारी पत्थर रख दिया जाता है यहाँ तक कि रीर की चर्बी से अंगारे बुझते है। उसकी आवाज़ का का साथ देने वाली बूढी स्त्री को क्रूरता से भाला मारकर हीद किया जाता है। वह अपने मुट्ठी भर मतवालो की दर्दनाक कराहें सुनता है, लेकिन वह यही कहता है कि ईश्वर  का ही दूत है। वह जिस मार्ग से गुज़रता है उस पर काॅटे बिछाये जाते है। उसको इतने पत्थर मारे जाते है कि उसका षरीर खून में नहा जाता है और जूतो में खून भर जाने से पैर जूतों से चिपक जाते है। पाॅँव जवाब दे जाते है। थक कर बैठता है तो जबरदस्ती खडा कर दिया जाता है, पत्थरो की वर्षा फिर षुरू हो जाती है। परन्तु वह कांटे बिछाने वालो और पत्थर मारने वालो को दुआ देता है। उसके सिर पर रोजाना अपनी छत से कूड़ा फैंकने वाली स्त्री जब बीमार हो जाती है तो वह उसकी खै़रियत पूछने जाता है। जिन अत्याचारो को 13 घंटे सहन करना असम्भव है, उन्हें वह और उसके साथी निरन्तर 13 वर्षो तक सहन करते है।
और अन्त में वह सभी अपना घर और वतन छोड़ने पर मजबूर कर दिये जाते है। 13 वर्षो तक यह घोर अत्याचार सहन करने वाला यही कहता रहता है कि लोगो! में तुम्हारी ओर ईष्वर का दूत हूँ। अपने देष से 500 किमी0 दूर उसे षरण मिलती है, मदीने की बस्ती के लोग उस पर ईमान लाते है। यहाँ धीरे धीरे अनुयायियों की संख्या बढ़ती है। मक्के से उसके जो साथी षरणार्थी बनकर आये थे वह भी अब खुषहाल हो गये हैं। जो मदीने का बेताज़ बादषाह बन गया है उसकी पत्नियाँ एक दिन यह मांग करती है कि हे ईष्दूत अब तो हर घर में खुषहाली आ गयी है अब कुछ हमारे गुजारे में भी वृद्धि होनी चाहिए। वह व्यक्ति उत्तर देता है कि उन्हे स्वतन्त्रता है कि दो में से किसी एक का चयन कर लें, उससे अलग रहकर खुषहाली का जीवन व्यतीत कर लें या उसके साथ रहकर फ़ाक़ो का।
वतन वाले यहां भी पीछा नही छोड़ते। उस पर सेनाएं इकट्ठा करके चढ़ाईयां करते है। षान्ति के दूत को षस्त्र उठाने के लिये मजबूर करते हैं। आखिर आठ साल मदीने में जीवन बिताने के बाद मक्के की विजय का दिन आता है। जिन षत्रुओं ने उसका जीना दूभर का दिया था उनके लिए वह सार्वजनिक क्षमा की घोषणा करता है। यहां तक की जिन घरो से उसको और उसके साथियो को निकाला गया था, विजेता के रूप में मक्के मंे प्रवेष के पष्चात उन्हें भी वापस नही लेता। वह सांसरिक ऐष्वर्यमय जीवन का इच्छुक नही है। उसकी तो केवल एक इच्छा है। लोग अपने असली ईष्वर को पहचान लें और अपने स्वामी के संदेष को स्वीकार कर लें।
23 वर्षो में अरब के कोने-कोने में षान्ति स्थापित हो गयी। समय के क्रूरतम आतंकी षान्ति के दूत बन गये। ऊँटो के चराने वाले क़ौमों के इमाम (मार्गदर्षक) बन गये। विष्व इतिहास की इस आष्चर्यजनक क्रान्ति का वह हीरो जिसकी दृष्टि के एक संकेत पर जान न्योछावर करना उसके परवाने अपने जीवन का उद्देष्य समझते है, उसके स्वर्गवास के पष्चात उसकी पत्नी की गवाही सुनिये, ’’उस व्यक्ति ने अपने जीवन काल में कभी पेट भर रोटी नही खायी थी ’’। वह व्यक्ति जीवन भर यह कहता रहा कि लोगो में झूठ नही बोलता, में ईष्वर का दूत हूँ।
वह, जिसको लिखना पढ़ना नही आता था, उसने संसार को आष्चर्यजनक तत्वज्ञान दिया। उसने दुनिया को अभूतपूर्व आर्थिक प्रणाली प्रदान की। उसने नागरिक षास्त्र के वह सिद्धान्त पेष किये जो अद्वितीय हैं। उसने समाज षास्त्र के सफलतम आधार स्थापित किये। उसने अत्यन्त भटकी हुई कौम को नैतिकता के सर्वोच्च षिखर तक पहँुचा दिया। उसने दासता के बाजार में समानता का ऐसा अविष्वसनीय ष्वास फूँक दिया कि इतिहास ने ऐसा दृष्य भी देखा जब एक गुलाम ऊट पर सवार है और समय का हाकिम उसकी नकेल पकडे पैदल चल रहा है। उसने राजनीति के अद्भुत नमूने प्रस्तुत किये। उसने महान सेनापति कि रूप में अपना लोहा मनवाया। उसने समाजिक क्रान्ति का पवित्र दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उसने न्याय की अद्वितीय प्रणाली स्थापित की। गै़र मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिपिबद्ध इतिहास पृष्ठ साक्षी है कि यह तमाम गुण उस व्यक्ति में 23 वर्ष की असम्भव अवधि में प्रकट हुये और इतिहास इस बात का भी साक्षी है की उसने कभी अपने जीवन में उन पर गर्व नही किया बल्कि वह व्यक्ति सदैव यही कहता रहा कि लोंगो में जो कुछ कर रहा हुँ ईष्वर के मार्गदर्षन में कर रहा हूँ, तुम सबकी ओर में ईश्वर का दूत हूँ।

इन तमाम विषेषताओं से परिपूर्ण उस व्यक्ति ने अपने अनुयायियों के सिर को कभी अपने सम्मान हेतु अपने आगे नही झुकने दिया बल्कि उसने तो यह भी पसन्द नही किया उसकी सभा में लोग उसके आदर सत्कार के लिए खडे हों। अपना चित्र बनाने से इसलिए मना कर दिया कि उसके स्वर्गवास के उपरान्त लोग श्रद्धा में सीमाओ का उल्लंघन कर उसके चित्र की पूजा न करने लगें। उसने सदैव यही कहा कि पूजा के योग्य सिर्फ एक ईष्वर एक खुदा है। मैं तो केवल ईश्वर का दूत एवं दास हूँ।
क्या इन 23 वर्षो की परिस्थितियों व घटनाओं का एक-एक क्षण पुकार-पुकार के गवाही नही दे रहा है कि यह किसी झूठे व्यक्ति का जीवन नही है? वह अपने दावे से सच्चा था। वह ईश्वर का दूत था।(उन पर षान्ति हो)

उसकी महानता को तो आप भी स्वीकार करते है परन्तु आप यह मानने को तैयार नही है कि वह ईश्वर का दूत हो सकता था। आप माने या न मानें, इसका आपको अधिकार है परन्तु यह सुनले कि यह परिस्थिति मूलक गवाही(circumstaintial evidence) घटिया गवाही नही है। मेरे पास आकर कोई व्यक्ति यह कहे कि वह व्यापरी है, कुछ समय वह मेरे पास रहें और में देखूँ कि वह व्यापार के तमाम रहस्यों से परिचित है। उसकी बताई हुई योजनाओं को कार्यान्वित करने से मेरे व्यापार में उन्नती भी हो और वह व्यक्ति मुझसे किसी भी प्राकार के लाभ व बदले का इच्छुक न हो तो मेरे पास यह सन्देह करने का कोई उचित कारण न होगा कि वह व्यापरी नही है।

लेकिन अभी रूके। गवाही केवल परिस्थिति मूलक ही नही दस्तावेजी़ सबूत(documentry  evidence) भी विद्यमान है। एक नही अनेक है। उसके आने से पूर्व ही से, षताब्दियों पहले से संसार के अनेकों धर्मो के ग्रन्थ उसके आने की गवाही देते चले आ रहे है। यह प्रमाण आज भी मौजूद है। यह बाद में क्रमबद्ध किये हुय(
afterthought ) नही है। यह महान गवाहियाँ किसी तरह से घटिया गवाहियाँ नही मानी जासकतीं। आप अधिक से अधिक यह कह सकते है कि गवाही में प्रस्तुत किये जाने वाले ग्रन्थों को भी आप ईष्वर प्रेषित ग्रन्थ नही मानते, परन्तु इससे गवाही कमजो़र नही होती। वह ईश्वर की ओर से हों या मनुष्यों के बनाये हुये, यह दस्तावेज़ उसके संसार में आने से षताब्दियों पहले से मौजूद है और यह वास्तविकता उनको अत्यन्त प्रमाणित गवाहों की पंक्ति में खडा करती है।

परन्तु आपके पास षक करने का एक कारण बाकी है। उस व्यक्ति का प्रस्तुत किया हुआ कलाम(वाणी) जिसे वह ईश्वर का कलाम कहता था और आप उसे ईश्वर का कलाम मानने को तैयार नही है। इस कलाम पर आपकी जो षंकाएं है उन्हे में आपकी अगली आपत्तियों के उत्तर में दूर करने का प्रयास करूँगा।


















Wednesday, 25 January 2017

पश्चिमी उजाला जनवरी 2017

पश्चिमी उजाला अंक जनवरी
प्रस्तुत लेख इस्लामिक स्कालर "सैयद अब्दुल्ला तारिक "की किताब "गवाही" से लिया गया है यह किताब तारिक साहब ने श्रीमान दिवाकर राही साहब के लेख ’’ वेद से कुरआन तक का सफर’’ में धर्म और पैगम्बरवाद के प्रति की गई आपत्तियां के जवाब में लिखी गई थी यें आपत्तियाँ आप तौर पर काफी लोगो के मन मे होती इसी कारण हमने तारिक साहब द्वारा लिखित ’’गवाही’’ नामक किताब को किस्तवा पष्चिमी उजाला में प्रकाषित कर रहें है अगर आप पूरी किताब एक साथ पढ़ना चाहते है तो आप हमसे सम्पर्क कर सकते है।
आपत्ति ईश्वर या खुदा सारे ब्रह्राण्ड का स्वामी है, सृष्टिकर्ता है, सर्वषक्तिमान और सर्वव्यपक है तथा सर्वज्ञ है तो फिर यह समझ में नही आता कि आखिर वह इतना मजबूर क्यूं है कि वह अपना पैगा़म देने के लिए अपने ही द्वारा बनाये हुए इन्सान का सहारा ले अथवा उसके माध्यम से ही अपनी किताब अपने बन्दो तक पहुँचा सके, स्वयं कोई ऐसा तरीका़ इख्तियार न कर सके जिससे वह सीधे बन्दो के हृदय तक अपना सन्देष पहुँचा सके? वह क्यों किसी विषेष व्यक्ति को यह उत्तरदायित्व सौपें कि वह दूसरों को यह बताए कि खुदा ने उसके ज़रिये क्या कहलाया है।.................................में नही मानता कि अगर खुदा है और ऐसा ही है जैसा इस्लाम कहता है तथा अन्य धर्म भी कहते है तो वह इतना असहाय नही हो सकता।
उत्तरः आपकी आपत्ति उतनी ही पुरानी है जितनी पैग़म्बरवाद(ईषदूतत्व) का इन्कार करने वालों की पृथ्वी पर मौजूदगी़। कुरआन ने हमे बताया कि पिछले ईषदूत को न मानने वाले भी उनके काल में यह आपत्ति(ऐतराज़) किया करने थे कि यह कैसा पैगम्बर है, यह तो (खाता, पीता और चलता, फिरता ) हमारी ही तरह का एक इन्सान है। आपने अपने लेख में किसी जगह यह नही कहा आप ईषवर को उसके उन सारे गुणों के साथ ख्ुदा नही मानते जिनका आपने वर्णन किया है और जो विष्व के करीब-करीब सभी धर्मो की मान्यता का भाग है, अगर ऐसा हाता तो आप सीधे ईष्वर और ईष्वरीय गुणों के इन्कार पर लेख लिख देते, कुरआन, रिसालत और हज़रत मुहम्मद स0 कि विषय में कुछ कहने की जरूरत ही नही पढती। अतः में यह मानकर उत्तर दे रहा हूँ कि आप खुदा की खुदाई को उसी तरह स्वीकार करते है जिस तरह संसार के अधिकतर धर्म मानते है और उसे सृष्टिकर्ता और सर्वषक्तिमान के साथ-साथ सर्वनियामक भी मानते है ं
आपके ऐतराज़ का यह ढंग विचित्र है कि ईष्वर ने अगर किसी इन्सान को दूत बनाया तो आप ईष्वर को असहाय कह रहे है, मानो वह कोई और ढंग इख्तियार कर ही नही सकता था। इस तर्क षैली पर तो आप यह सवाल भी उठा सकते है कि ईष्वर ने बच्चे के पालन पोषण के लिए अपने द्वारा बनाई हुई स्त्री का सहारा क्यों लिया? क्या ईष्वर बच्चे को जन्म से ही चलना, फिरना,खाना,पीना, सिखा देने से मजबूर था? और इस प्रकार के अनेको प्रष्न कर सकते है कि ईष्वर ने मनुष्य का पेट भरने के लिए मनुष्य ही के उन हाथों का सहारा क्यों लिया जो स्वंय ईष्वर ने उसे प्रदान किये है? क्या ईष्वर इतना असहाय था कि बिना हाथ हिलाये पेट नही भर सकता था? सकने या न सकने का यहाँ क्या प्रष्न है। स्पष्ट षब्दों में यूँ कहिए कि ईष्वर ने आपकी बुद्धि के अनुसार ब्रह्राण्ड का प्रबन्ध किया होता तो आप ऐतराज़ नही करते।
संसार मेंं मनुष्य को पैदा करने तथा अच्छे बुरे कार्य करने की आजादी देने के बाद यह तो आप भी मानते है कि ईष्वर को अपने बन्दो के मार्ग-दर्षन का प्रबन्ध करना चाहियें था, यद्यपि आपने इसके लिए यह प्रस्ताव रखा है कि वह उनके मन में सीधे अपना सन्देष उतार देता। बेषक ईष्वर इस कि क्षमता रखता था और रखता है परन्तु इसमें सबसे बडी त्रुटि यह है कि फिर हर मनुष्य आकर अपना अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करता कि ईष्वर ने उसके मन में यह विचार डाला है। कर्मक्षेत्र में स्वतन्त्रता मिलने के बाद सीधे ईष्वर की ओर से मन में सही मार्ग का अवतरण होना इस की गारन्टी नही बन सकता कि मनुष्य ईष्वर की आज्ञा का उल्लंघन नही करेगें। यह बात स्पष्ट रहे कि ईष्वर ने अपने बन्दों के मार्गदर्षन का प्रबन्ध हर क्षेत्र में किया है। उन्हें एक सम्पूर्ण जीपन संविधान दिया है। अब अगर वह कोई एक कसोटी या प्रमाणिक पुरूष को नामाकिंत करने के बजाये प्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति के मन में यह बात डालता तो हर नास्तिक यह दावा कर सकता था कि ईष्वर का दिया हुआ विधान वह प्रस्तुत कर रहा है एक व्यक्ति यह दावा कर सकता था कि ईष्वर ने चोर का हाथ काटने का आदेष दिया है दुसरा कह सकता था नही, जेल में डाल देने का आदेष दिया है। चोर के सम्बन्धी यह कहते के कि डांट डपट कर छोड देने का आदेष है , और स्वयं चोर यह दावा कर सकता था कि स्वंय ईष्वर ने उसके मन में चोरी करने का विचार डाला था और वह चोर ईष्वर की नीति के अनुसार कर रहा है, अतः बजाये दण्ड के पुरूस्कार का हकदार ठहरा। आपके द्वारा प्रस्तुत कार्यप्रणाली पर