Friday, 29 December 2017

दिसंबर 2017 अंक















आपत्ति- मैं जानता हंू कि धर्मग्रन्थ में समानताएं बल्कि अधिकतर समानताएं ही है। पर प्रश्न उस शेष का जो समान नही है जो समानतओं वाले बहु भाग पर आच्छादित होकर उसको निष्क्रिय बना बैठा है....जब तक इस समस्या को नही समझा जायेगा उससे नही निपटा जायेगा अथवा उसे हल नही किया जायेगा, समानता का लाख दावा कीजिए, प्रचार कीजिए उससे कुछ ठोस और अच्छा परिणाम निकलने वाला नही है।

उत्तर- आपकी आपत्ति कें मध्य में मैं ने कुछ भाग बिन्दु लगाकर छोड़ दिया है क्योंकि वहां आपके शब्द कठोर हो गये हैं और मैंेने उन्हें नकल करना उचित नही समझा। आपने उस भाग में यह कहना चाहा है कि धर्म के अनुयायी को पहले अपनी धार्मिक पुस्तक के अपरिवर्तनीय होने की मान्यता को छोड़ना पड़ेगा वरना संभाव के खोखले दावे करने से कुछ प्राप्त नही, दावा सच्चा था या नही और उनका लाया हुआ कलाम अल्लाह का कलाम है या नहीं और इन प्रश्नों पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं, उनके जीवन काल में ही उन पर बहुत से अरब वासी ईमान नही लाये थे। गौतम बुद्ध भारतवर्ष मे जन्मे परन्तु उनके अनुयायियों की संख्या करोड़ो में होते हुए भी भारत वर्ष में बुद्धमत के माननें वाले नाम मात्र हैं। यदि दूत को अस्वीकार करना ही है तो कीजिए। बहुत से लोग करते आ रहे हैं। परन्तु यह प्रश्न अर्थहीन है कि वह अरब में क्यों पैदा हुए।

 रहा प्रश्न इस बात का क्या वह सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड के लिये अन्तिम दूत हैं, तो इस्लाम इसका उत्तर हां में देता है। अगर आप पूछें कि अरब मे उनके उत्पन्न होने के बाद सन्देश उन अन्य स्थानों पर कैसे पहुंचता है जिनमे बौद्धिक प्राणी मौजूद हैं तो मैं उत्तर दंूगा कि यह प्रश्न नियत समय से पूर्व है। जब विज्ञान इतनी उन्नति कर जाये कि उन धरतियों के जीवों का हमसे वार्तालाप का सम्बन्ध स्थापित हो जाये तो उस समय यह प्रश्न उचित होगा। इतना निश्चित है कि अर अन्तिम दूत किसी और धरती पर अवतरित हो गये होते तो यह हमारे साथ अन्याय होता क्योंकि हमने अभी इतनी उन्नति नही की है कि वहां से उनका सन्देश हम तक पहुंच सके जबकि यह बिल्कुल निश्चित नहीं है कि उन धरतियों के प्राणी हमसे अधिक विकसित नहीं है कि इस धरती की घटनाओं को अपने यहां रिकार्ड न कर सकें। इससे विपरीत अभी तक वैज्ञानिकों का अनुमान और गुमान यही है कि किसी अन्य ग्रह की कोई अपरिचित जाति हमसे अधिक उन्नत है। हमारे पास बड़ी संख्या में अंतरिक्ष से आने वाले ऐसे रहस्यमय संकेत और सिग्नल रिकार्ड किये गये हैं जिनके विषय मे अनुमान है कि यह अन्तरिक्ष के प्राणियों ने हमें भेजे हैं। उड़न खटोलों (न्ण्थ्ण्व्े)में से अधिकतर कथाएं काल्पनिक होते हुए भी सभी उड़न खटोलों (न्ण्थ्ण्व्े) को हमारे विज्ञान ने अस्वीकार नही किया है। हमारा विज्ञान अभी तक यह भी ज्ञात नही कर सका है कि अंतरिक्ष मे जिन प्राणियों की किसी और ग्रह पर उपस्थिति की सम्भावनाएं हैं वह कहां हैं जबकि वह होगा।
 दिवाकर साहब, समानताएं मिल बैठने का आधार होती हैं परन्तु अगर हर धर्म के अनुयायी अपने-अपने धार्मिक ग्रन्थ को परिवर्तनीय समझ कर मिल बैठेंगे तो वह अकबर का ‘दीने इलाही’ तो बनाकर उठ सकते हैं, ईश्वर का भेजा हुआ दीन नही ढूंढ सकतेे। समभाव का यह उददेश्य हरगिज नही समझें कि हर धर्म में नैतिक शिक्षाएं समान पाई जाती हैं तो उनका अधिकतर भाग समान हो गया। धर्म या दीन की मूल मान्यताओं को देखना होगा कि कहां तक समान हैं। समान मूल्यों पर एकत्र होने वाले दो समूह अगर मिल बैठकर एक दूसरे को समझने-समझाने का मार्ग अपनाएं और यह समझना-समझाना अच्छी और सुलझी भाषा में हो, न कि एक दूसरे को ठेस पहुंचाने वाली भाषा में, तो उसके अच्छे परिणाम अवश्य निकलेंगे। मुझे कहने दीजिए कि आपने समान मूलाधार खोजने के बजाये पहले ही चरण में विरोधी तत्वाों से सीधे आपत्ति का मार्ग अपनाया और उससे भी अधिक यह कि इसमें भी वह भाषा का प्रयोग किया जो आपकी पारंपरिक साहित्यक भाषा नही थी तो उसके फलस्वरूप घृणा के भयानक तूफान उठ खड़े हुए। मैं आशा करता हंू कि भविष्य मेें हमारे बीच समझने-समझाने के बेहतर आधार स्थापित होंगे।

 हे ईश्वर ! मेरा दर्द मेरे धर्म के उन लोगों तक पहंुचा दे जिनसे मेरा खुदा और रसूल के नाते से सम्बन्ध है।

हे ईश्वर! मेरे शब्दों को प्रभावी रूप मंे दिवाकर राही के मन में उतार दे जिससे मेरा आदम अ0 और हव्वा अ0 की सन्तान के नात सम्बन्ध हैं।







Sunday, 26 November 2017

November 2017




आपत्ति- असंख्य सौर जगत हैं और इस सौर जगत की हकीकत महासागर में एक बंूद की हकीकत से ज्यादा नही, फिर इस सौर जगत में भी इस पृथ्वी की कोई हैसियत नही है और इस पृथ्वी में अरब जैसे छोटे से देश की हैसियत नही है। प्रश्न यह है कि....उन्होंने (अल्लाह ने) अरब में ऐसे कौन से गुण देखे की समस्त ब्रहमाण्ड को ताक पर रख कर अरब को एक ऐसा पैगम्बर और एक ऐसी किताब दे दी कि अब अनन्तकाल के लिये समस्त ब्रहमाण्ड इस नेयमत से वंचित हो गया।

उत्तर- अरब और गैर अरब का विवाद आप कहां ले बैठे। इस्लाम का सन्देश सारी पृथ्वी और सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड के बौद्धिक प्राणियो के लिये है। जब मुनष्य ने इतनी उन्नति नही की थी कि एक क्षेत्र की सूचनाएं और रिकार्ड दूसरे क्षेत्र तक पहुंचा सके तो हर क्षेत्र के लिये अलग-अलग दूत भेजे जाते थे। यह दूरियां सिमट गईं तो यह आश्यकता समाप्त हो गई। एक अन्तिम दूत उस समय में आना था जब यह दूरियां समाप्त हो जाएं। हालांकि संसार के अनेक धर्मो के ग्रन्थ ‘काबे’ को संसार का पहला पूजास्थल और धरती की नाभि मानते हैं और इस दृष्टिकोण से उस दूत के जन्म इस वाद-विवाद में पड़ने की आवयकता ही नही है कि मक्का ही क्यों। यह समझें कि वह संसार के किसी भी भाग में अवतरित हो सकता था, अरब में हो गया तो इसमें आपत्ति की क्या बात है। क्या अगर वह भारतवर्ष में होते तो आप उन पर ईमान लाते ? प्रश्न उनके अरब या अमेरिका या जापान में जन्म लेने का नही होना चाहिए। वह अरब के अतिरिक्त कहीं और पैदा हुए होते तब भी उनकी शिक्षाएं आसानी के साथ हर किसी तक पहुंच जातीं जिस तरह संचार व्यवस्था की उन्नति के इस काल में हम तक पहंुच चुकी है। परखने की वास्तविक चीज यह है कि उनका पैगम्बरी का इतने आगे निकल चुके है कि अपने संकेत (ैपहदंसे) भी भेज रहे हैं, उन्हें हम अभी समझ (क्मबवकम) नही पा रहे हैं। इतना ही नही, बल्कि उन प्राणियों कें धरती पर आकर वापस जाते रहने की सम्भावनाओं को नकारा नही जा सकता है। निष्कर्ष यह कि ऐसी कोई जाति जहां कहीं पाई जाती है वह हमारी उपेक्षा अधिक विकसित हो सकती है। सम्भव है कि उसके पास ऐसे साधन हों कि हमारे रिकार्ड वह अपने यहां स्थानान्तरित कर सकते हों। जब तक उनसे परस्पर वार्तालाप का सयम न आ जाये यह प्रश्न उठाना अभी अर्थहीन है कि अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 उस जाति के लिये अन्तिम कैसे हुए, परन्तु यह भी स्पष्ट रहे कि इस प्रश्न को उस समय तक उठा रखने से इस्लाम का दावा गलत सिद्ध नही होता। जिस प्रकार सूर्य की परिक्रमा जैसे बहुत से कुरआनी वक्तव्यों की महानता अब बीसवीं शताब्दी में आकर ही खुल सकी है उसी प्रकार कुरआनी चमत्कार का यह पहलू किसी और समय में सामने आयेगा।