Thursday, 29 March 2018
Friday, 26 January 2018
Friday, 29 December 2017
दिसंबर 2017 अंक
आपत्ति- मैं जानता हंू कि धर्मग्रन्थ में समानताएं बल्कि अधिकतर समानताएं ही है। पर प्रश्न उस शेष का जो समान नही है जो समानतओं वाले बहु भाग पर आच्छादित होकर उसको निष्क्रिय बना बैठा है....जब तक इस समस्या को नही समझा जायेगा उससे नही निपटा जायेगा अथवा उसे हल नही किया जायेगा, समानता का लाख दावा कीजिए, प्रचार कीजिए उससे कुछ ठोस और अच्छा परिणाम निकलने वाला नही है।
उत्तर- आपकी आपत्ति कें मध्य में मैं ने कुछ भाग बिन्दु लगाकर छोड़ दिया है क्योंकि वहां आपके शब्द कठोर हो गये हैं और मैंेने उन्हें नकल करना उचित नही समझा। आपने उस भाग में यह कहना चाहा है कि धर्म के अनुयायी को पहले अपनी धार्मिक पुस्तक के अपरिवर्तनीय होने की मान्यता को छोड़ना पड़ेगा वरना संभाव के खोखले दावे करने से कुछ प्राप्त नही, दावा सच्चा था या नही और उनका लाया हुआ कलाम अल्लाह का कलाम है या नहीं और इन प्रश्नों पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं, उनके जीवन काल में ही उन पर बहुत से अरब वासी ईमान नही लाये थे। गौतम बुद्ध भारतवर्ष मे जन्मे परन्तु उनके अनुयायियों की संख्या करोड़ो में होते हुए भी भारत वर्ष में बुद्धमत के माननें वाले नाम मात्र हैं। यदि दूत को अस्वीकार करना ही है तो कीजिए। बहुत से लोग करते आ रहे हैं। परन्तु यह प्रश्न अर्थहीन है कि वह अरब में क्यों पैदा हुए।
रहा प्रश्न इस बात का क्या वह सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड के लिये अन्तिम दूत हैं, तो इस्लाम इसका उत्तर हां में देता है। अगर आप पूछें कि अरब मे उनके उत्पन्न होने के बाद सन्देश उन अन्य स्थानों पर कैसे पहुंचता है जिनमे बौद्धिक प्राणी मौजूद हैं तो मैं उत्तर दंूगा कि यह प्रश्न नियत समय से पूर्व है। जब विज्ञान इतनी उन्नति कर जाये कि उन धरतियों के जीवों का हमसे वार्तालाप का सम्बन्ध स्थापित हो जाये तो उस समय यह प्रश्न उचित होगा। इतना निश्चित है कि अर अन्तिम दूत किसी और धरती पर अवतरित हो गये होते तो यह हमारे साथ अन्याय होता क्योंकि हमने अभी इतनी उन्नति नही की है कि वहां से उनका सन्देश हम तक पहुंच सके जबकि यह बिल्कुल निश्चित नहीं है कि उन धरतियों के प्राणी हमसे अधिक विकसित नहीं है कि इस धरती की घटनाओं को अपने यहां रिकार्ड न कर सकें। इससे विपरीत अभी तक वैज्ञानिकों का अनुमान और गुमान यही है कि किसी अन्य ग्रह की कोई अपरिचित जाति हमसे अधिक उन्नत है। हमारे पास बड़ी संख्या में अंतरिक्ष से आने वाले ऐसे रहस्यमय संकेत और सिग्नल रिकार्ड किये गये हैं जिनके विषय मे अनुमान है कि यह अन्तरिक्ष के प्राणियों ने हमें भेजे हैं। उड़न खटोलों (न्ण्थ्ण्व्े)में से अधिकतर कथाएं काल्पनिक होते हुए भी सभी उड़न खटोलों (न्ण्थ्ण्व्े) को हमारे विज्ञान ने अस्वीकार नही किया है। हमारा विज्ञान अभी तक यह भी ज्ञात नही कर सका है कि अंतरिक्ष मे जिन प्राणियों की किसी और ग्रह पर उपस्थिति की सम्भावनाएं हैं वह कहां हैं जबकि वह होगा।
दिवाकर साहब, समानताएं मिल बैठने का आधार होती हैं परन्तु अगर हर धर्म के अनुयायी अपने-अपने धार्मिक ग्रन्थ को परिवर्तनीय समझ कर मिल बैठेंगे तो वह अकबर का ‘दीने इलाही’ तो बनाकर उठ सकते हैं, ईश्वर का भेजा हुआ दीन नही ढूंढ सकतेे। समभाव का यह उददेश्य हरगिज नही समझें कि हर धर्म में नैतिक शिक्षाएं समान पाई जाती हैं तो उनका अधिकतर भाग समान हो गया। धर्म या दीन की मूल मान्यताओं को देखना होगा कि कहां तक समान हैं। समान मूल्यों पर एकत्र होने वाले दो समूह अगर मिल बैठकर एक दूसरे को समझने-समझाने का मार्ग अपनाएं और यह समझना-समझाना अच्छी और सुलझी भाषा में हो, न कि एक दूसरे को ठेस पहुंचाने वाली भाषा में, तो उसके अच्छे परिणाम अवश्य निकलेंगे। मुझे कहने दीजिए कि आपने समान मूलाधार खोजने के बजाये पहले ही चरण में विरोधी तत्वाों से सीधे आपत्ति का मार्ग अपनाया और उससे भी अधिक यह कि इसमें भी वह भाषा का प्रयोग किया जो आपकी पारंपरिक साहित्यक भाषा नही थी तो उसके फलस्वरूप घृणा के भयानक तूफान उठ खड़े हुए। मैं आशा करता हंू कि भविष्य मेें हमारे बीच समझने-समझाने के बेहतर आधार स्थापित होंगे।
हे ईश्वर ! मेरा दर्द मेरे धर्म के उन लोगों तक पहंुचा दे जिनसे मेरा खुदा और रसूल के नाते से सम्बन्ध है।
हे ईश्वर! मेरे शब्दों को प्रभावी रूप मंे दिवाकर राही के मन में उतार दे जिससे मेरा आदम अ0 और हव्वा अ0 की सन्तान के नात सम्बन्ध हैं।
Sunday, 26 November 2017
November 2017
आपत्ति- असंख्य सौर जगत हैं और इस सौर जगत की हकीकत महासागर में एक बंूद की हकीकत से ज्यादा नही, फिर इस सौर जगत में भी इस पृथ्वी की कोई हैसियत नही है और इस पृथ्वी में अरब जैसे छोटे से देश की हैसियत नही है। प्रश्न यह है कि....उन्होंने (अल्लाह ने) अरब में ऐसे कौन से गुण देखे की समस्त ब्रहमाण्ड को ताक पर रख कर अरब को एक ऐसा पैगम्बर और एक ऐसी किताब दे दी कि अब अनन्तकाल के लिये समस्त ब्रहमाण्ड इस नेयमत से वंचित हो गया।
उत्तर- अरब और गैर अरब का विवाद आप कहां ले बैठे। इस्लाम का सन्देश सारी पृथ्वी और सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड के बौद्धिक प्राणियो के लिये है। जब मुनष्य ने इतनी उन्नति नही की थी कि एक क्षेत्र की सूचनाएं और रिकार्ड दूसरे क्षेत्र तक पहुंचा सके तो हर क्षेत्र के लिये अलग-अलग दूत भेजे जाते थे। यह दूरियां सिमट गईं तो यह आश्यकता समाप्त हो गई। एक अन्तिम दूत उस समय में आना था जब यह दूरियां समाप्त हो जाएं। हालांकि संसार के अनेक धर्मो के ग्रन्थ ‘काबे’ को संसार का पहला पूजास्थल और धरती की नाभि मानते हैं और इस दृष्टिकोण से उस दूत के जन्म इस वाद-विवाद में पड़ने की आवयकता ही नही है कि मक्का ही क्यों। यह समझें कि वह संसार के किसी भी भाग में अवतरित हो सकता था, अरब में हो गया तो इसमें आपत्ति की क्या बात है। क्या अगर वह भारतवर्ष में होते तो आप उन पर ईमान लाते ? प्रश्न उनके अरब या अमेरिका या जापान में जन्म लेने का नही होना चाहिए। वह अरब के अतिरिक्त कहीं और पैदा हुए होते तब भी उनकी शिक्षाएं आसानी के साथ हर किसी तक पहुंच जातीं जिस तरह संचार व्यवस्था की उन्नति के इस काल में हम तक पहंुच चुकी है। परखने की वास्तविक चीज यह है कि उनका पैगम्बरी का इतने आगे निकल चुके है कि अपने संकेत (ैपहदंसे) भी भेज रहे हैं, उन्हें हम अभी समझ (क्मबवकम) नही पा रहे हैं। इतना ही नही, बल्कि उन प्राणियों कें धरती पर आकर वापस जाते रहने की सम्भावनाओं को नकारा नही जा सकता है। निष्कर्ष यह कि ऐसी कोई जाति जहां कहीं पाई जाती है वह हमारी उपेक्षा अधिक विकसित हो सकती है। सम्भव है कि उसके पास ऐसे साधन हों कि हमारे रिकार्ड वह अपने यहां स्थानान्तरित कर सकते हों। जब तक उनसे परस्पर वार्तालाप का सयम न आ जाये यह प्रश्न उठाना अभी अर्थहीन है कि अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 उस जाति के लिये अन्तिम कैसे हुए, परन्तु यह भी स्पष्ट रहे कि इस प्रश्न को उस समय तक उठा रखने से इस्लाम का दावा गलत सिद्ध नही होता। जिस प्रकार सूर्य की परिक्रमा जैसे बहुत से कुरआनी वक्तव्यों की महानता अब बीसवीं शताब्दी में आकर ही खुल सकी है उसी प्रकार कुरआनी चमत्कार का यह पहलू किसी और समय में सामने आयेगा।
Saturday, 28 October 2017
october2017
आपत्ति- ईश्वर या खुदा के सर्व-शक्ति सम्पन्न या कादिरे कुल होने की जो धारणा या आस्था है उससे पैगम्ब्र, अवतार या सन्देशवाहक को अन्तिम मानने की आस्था की कोई संगति नही है। खुदा को एक तरफ तो हम कादिरे कुल कहें और साथ ही कहें कि अब अनन्त काल तक ब्रहमाण्ड में स्थित असंख्य दुनियाओं में किसी भी दुनिया में चाहे कुछ हो जाये, कितना ही अनर्थ हो जाये, कितने ही पाप व अत्याचार हो, वह पैगम्बर न भेजने के लिये वचनबद्ध है। यह पूर्वापर विरोध नही तो और क्या है? प्रकारान्तर से इस मान्यता का अर्थ यह है कि अब खुदा में अपना पैगम्बर भेजने की ताक़त नही रही.... हर प्राणी का अधिकार है कि अपना सन्देश भेजने के लिये किसी पत्रवाहक के सुपुर्द यह काम कर दे पर खुदा को अब यह हक़ भी नही रह गया है।
उत्तर- अपनी आपत्ति की अन्तिम पंक्ति में जो कुछ आपने कहा है उसका अर्थ यह निकलता है कि खुदा को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपना सन्देश किसी सन्देशवाहक द्वारा भेज सके। सैद्धान्तिक रूप में आप पैगम्बरवाद को स्वीकार कर रहे हैं, जिस पर पिछले पृष्ठों में आपत्ति करते आये। इस्लाम की मान्यताओं में परस्पर विरोध का दोष लगाने के प्रयास में किसी न किसी भी प्रकार हर स्थान पर आपत्ति ढूंढते रहने से आप स्वंय विरोध का शिकार हो गये। या शायद यह वकीलों वाला अन्दाज है कि ‘मीलार्ड मेरा मुवक्किल घटना के समय घटनास्थल से सैंकड़ो मील दूर था परन्तु यदि वह घटनास्थल पर उपस्थित भी था तो वह अपराधी नही है।’ आप वकील है और आपने इसी अन्दाज को अपनाते हुए यह कहना चाहा कि पैगम्बरवाद का तत्व सिरे से ही निराधार है। परन्तु अगर ठीक भी है तो अनितम दूत को कोई हो ही नही सकता।
आपकी इस आपत्ति में भी आपकी सबसे पहली आपत्ति की तरह ‘नही भेज सकने’ के शब्द हैं। ईश्वर अब कोई नया दूत नही भेजेगा का अर्थ यह बिल्कुल नही है कि वह भेज सकने में समर्थ नही हैं। यह आपने नासमझों वाला तर्क प्रस्तुत किया हैं रहा यह प्रश्न कि एक विशेष समय तक ईश्दूतों के आने के पश्चात फिर दूतों के आने का क्रम रोक दिया गया और अब कोई नया दूत क्यों नही आयेगा तो इसका उत्तर निम्नलिखित है-
हज़रत मुहम्मद स0 ऐसे एकमात्र दूत हैं जो आधुनिक ऐतिहासिक काल में संसार में पधारे। उनसे पूर्व आने वाले सभी दूत व मार्गदर्शक ऐसे काल में दूत बनाये गये थे जो ऐतिहासिक युग नही था और इसलिये उनके जीवन के सम्पूर्ण हालात भी अंधकारमय हैं और उनकी पहुंचाई हुई ईशवाणी भी पूर्ण रूप से सुरक्षित नही रह सकी। इन्जील के विषय में सारे ईसाई शोधकर्ता सहमत हैं कि मौजूदा इन्जीलें अक्षरशः उन शब्दों में मौजूद नहीं जो हज़रत ईसा के मुख से निकले थे। यही दशा तौरेत की भी है। गौतम बुद्ध और श्री महावीर के अपने शब्दों में रचित कोई साहित्य संसार में विद्यमान नही है। बुद्ध के जो उपदेश संसार के विभिन्न भागों में मिलते हैं उनमे परस्पर बहुत विरोध है। वेदों के विषय मे बहुस से हिन्दु विद्धान स्कीकार करते हैं कि वर्तमान में उपलब्ध चार वेद अक्षरशः वह वेद नहीं है जो पहले कभी एक वे था ओैर स्मरण शक्तियों में सुरक्षित था। यह दावा केवल कुरआन के विषय में पूरे विश्वास के साथ किया जा सकता है और आसानी के साथ प्रामाणित किया जा सकता है कि वह अक्षरशः वही कुरआन है जो हज़रत मुहम्मद स0 ने सुनाया था और हज़रत मुहम्मद स0 संसार के वह अकेले दूत जिनके जीवन की एक-एक घटना जन्म से लेकर स्वर्गवास तक रिकार्ड है। उस काल में जिन लोगों को उन्हें दूत नही माना था, उन्होंने उनको बचपन से अपने सम्मुख बड़ा होते देखा और उनके आर्दश जीवन का स्वयं अवलोकन किया, तब भी उनके दूतत्व पर आस्था व्यक्त नही की। इस प्रकार अगर हज़रत मुहम्मद स0 या कोई और दूत स्वयं भी आज आस्था न रखने वालों से यह कहता कि मै्र ईशदूत हंू तो वह अस्वीकार ही करते। दूत के आने का उददेश्य यही नही होता कि वह आकर सबको आस्था रखने पर मजबूर कर देगा, बल्कि कलाम (ईशवाणी) के साथ दूत की उपस्थिति का सबसे बड़ा उददेश्य यही होता है कि वह कलाम के अनुसार स्वयं प्रत्यक्ष रूप में स्वयं आर्दश बनकर दिखा दे। अब जबकि कलाम भी सुरक्षित है और दूत के प्रत्यक्ष जीवन का एक-एक क्षण भी रिकार्ड में है, दूत के आने की आवश्यकता अब नही रही।
Friday, 29 September 2017
september 2017
आपत्ति- प्रत्येक धर्म मज़हब ने अपने-अपने सन्देश वाहक, पैगम्बर या संस्थापक को आखरी कहा है। हद यह है कि अनीश्वरवादी, जैन धर्म व बौद्ध धर्म में भी अपने तीर्थकर व बुद्ध को अन्तिम बताकर आगे के लिऐ तीर्थकरत्व व बौद्ध का दरवाजा बन्द कर दिया।
उत्तर- न केवल यह कि इस्लाम के मूल तत्वों के विषय में आपको अभी और अधिक जानकारी की आवश्यकता है, बल्कि अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी आपकी जानकारी में कमी है। खूब समझ लीजिए कि हज़रत मुहम्मद स0 साहब इस्लाम के संस्थापक हरगिज नही थे। उन्होंने पूरे जीवन में कभी यह दावा नही किया कि वह कोई नया धर्म प्रस्तुत कर रहे हैं। कुरआन ने कभी किसी एक स्थान पर भी यह नहीं कहा कि हजरत मुहम्म स0 के द्वारा ईश्वर किसी नये धर्म की स्थापना कर रहा है। पृथ्वी पर इस्लाम धर्म के पहले पैगम्बर हज़रत आदम अ0 थे जो संसार के पहले इन्सान थे। कुरआन की शिक्षा के अनुसार जब-जब संसार में बिगाड़ पैदा हुए और मानव, इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं से हटे तो ईश्वर ने अपने सन्देशवाहक, मार्ग दर्शन हेतु संसार में भेजे। ईश दूतत्व के इसी क्रम में अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 थे जो किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उसी धर्म को जीवित करने हेतु पधारे थे जिसकी शिक्षाओं को लोगों ने बिगाड़ दिया था। इसी प्रकार हजरत ईसा अ0 भी किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उनसे पूर्व जो बिगाड़ आ गया था उसको सुधारने हेतु पधारे। वर्तमान मत्ती की इन्जील (15ः18ः19) इसकी साक्षी है कि हज़रत ईसा अ0 ने तौरेत के अनुसार, जो उनसे पिछला ग्रन्थ था, आचरण करने का आदेश दिया था। बुद्धमत के अनुसार गौतमबुद्ध पहले बुद्ध न थे अर्थात वह भी बुद्धमत के संस्थापक नही थे। श्री महावीर पहले तीर्थकर नही वरन् उनके अनुसार उनका धर्म वही था जो पहले तीर्थकर ऋषभ देव जी का था और वैदिक धर्म का मामला तो बिल्कुल स्पष्ट है। यद्यपि पहले दूत का नाम वहां गुम हो चुका है परन्तु बाद में आने वाले बहुत से व्यक्तियों को हिन्दु धर्म का स्तम्भ माना जाता है। इस प्रकार पहले तो आप यह शंका दूर कर लें कि हर धर्म ने अपने संस्थापक को अन्तिम संदेशवाहक माना है। (असल में संदेशवाक के लिए संस्थापक शब्द ही गलत है। धर्म का संस्थापक ईश्वर है न कि मानव ईशदूत ईश्वरीय धर्म को स्थापित करने के लिये आते थे)।
अब आईये आपत्ति के दूसरे अंश की ओर और वह यह है कि हर धर्म ने अपने किसी संदेश वाहक को अन्तिम माना है आपका यह दावा भी भ्रम पर आधारित है। सबसे पहले वैदिक धर्म को लें -वेदों ने अपने एक महान दूत क ानाम ‘अग्नि’ बताया था, हम अग्नि को दूत (पैगम्बर) चुनते है।’ (़ऋग्वेद 1ः12ः1) 7 जुलाई 1990 के सहकारी युग में डा0 ऋषि चतुर्वेदी ने इस मंत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अग्नि’ इस मंत्र में किसी मनुष्य को नही बल्कि आग को ही अलंकारिक रूप में दूत कहा गया है। ऐसा नही है, बल्कि ऋग्वेद (1ः31ः15) में साफ साफा अग्नि को ‘नर’ अर्थात ‘मनुष्य’ बताया गया है फिर ऋग्वेद (3ः29ः11) में कहा गया है कि अग्नि का नाम ‘नराशंस’ है। वह ‘नराशंस’ नाम से ही संसार मे आयेगा। शब्द ‘नराशंस’ का अनुवाद ‘प्रशंसा’ योग्य मनुष्य अथवा ‘मोहम्मद’ होता है। फिर अथर्ववेद (20ः127ः1) में साफ साफ कह दिया गया कि नराशंस के आने पर उनकी बहुत प्रशंसा होगी, ऊंट उनकी सवारी होगी, उनकी कई पत्नियां होंगी। फिर उस समय के मक्के की जनसंख्या 60,090 होना, अलंकृत भाषा में हब्शा (इथोपिया) देश में शरण लेने वालों की संख्या 100 होना, 10 जन्नती सत्संगिंयों (अशरा मुबश्शिरा) का संकेत, बंदर के युद्ध में विजयी होकर लौटने वालों की संख्या 300 तथा मक्के की विजय के समय इस्लामी सेना की संख्या 10,000 होने का भी वर्णन किया गया है। वेद मन्त्रों का यह अनुवाद प्राचीन अनुवादकों पण्डित राजाराम और पण्डित खेमखरण के अनुवादों पर आधारित है। वर्तमान में चण्दीगढ़ विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर पण्डित वेद प्रकाश उपाध्याय ने यह सारी व्याख्यायें बहुत स्पष्ट शब्दो में लिखी हैं। श्री ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने हमारे इस अनुवाद को अस्वीकार करते हुए अनुवाद लिखा है वह शब्दो का ऐसा वागजाल है जिसका कोई अर्थ नही निकलता। इस प्रकार आप देखें कि दूत ने अपने अवतरण काल कें बहुत बाद नराशंस नाम के एक दूत के आने की भविष्यवाणी की थी और देव लाने वाले अज्ञात ऋषि को अन्तिम नहीं कहा गया था। गीता (4ः7) और श्रीमद् भागवत महापुराण (9ः24ः56) में यह धारणा अंकित है कि जब जब पृथ्वी पर धर्म में बिगाड़ पैदा हो जाता है तथा दुष्कर्म बढ़ जाते है। तब अवतार संसार में आते हैं (पौराणिक काल के ग्रन्थों में दूत के बजाये अवतार की धारणा है)।
यदूदियों की मौजूदा तौरेत और ईसाईयों की वर्तमान इन्जीलों में भी हज़रत मूसा और हज़रत ईसा को अन्तिम दूत नही कहा गया है। दोनांे में स्पष्ट रूप से बाद के किसी काल में आने वाले एक दूत को आने के संकेत दिये गये हैं इन्जील में इसको फारक़लीत (च्ंतंबसमजम व िच्मतपबसलजवे) कहा गया है। जिसका अनुवाद है ‘प्रशंसा योग्य’ अथवा ‘मुहम्मद’। तौरेत व इन्जली के उदाहरण आपने विस्तार से मेरी पुस्तक ‘कितने दूर कितने पास’ में देखें होंगे। इसलिये तफसीलात छोड़ रहा हंू। हालंाकि वेदों के दृष्टांत भी उक्त पुस्तक में हैं परन्तु क्योंकि डा0 ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने इस पर आपत्तियां की थीं अतः संक्षेप में ऊपर उसका पुनरोल्लेख कर दिया है। गौतम बुद्ध ने भी स्वयं को अन्तिम ‘बुद्ध’ नही कहा था। जब बुद्ध के शिष्य ‘आनन्द’ ने प्रश्न किया, ‘आपके जाने के बाद कौन मार्ग-दर्शन करेगा’ ? बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘मैं पृथ्वी पर आने वाला न तो पहला बुद्ध हंू और न अन्तिम हंूगा। अपने समय में पृथ्वी पर एक पहला बुद्ध आयेगा वह पवित्र, अति बुद्धिमानी होगा। शुभ सृष्टि का ज्ञाता, मानव जाति का अद्वितीय नेता, फरिश्तों और अनितय मनुष्यों का गुरू होगा। मैं ने तुम्हें जो सत्य बातें बताई हैं वह तुम्हें बतायेगा। वह ऐसे धर्म का प्रचार करेगा जिसका प्रारम्भ भी उज्जवल होगा। वह ऐसा धार्मिक जीवन व्यतीत करेगा जो पूर्ण व पवित्र होगा, जैसा कि मेरा ढंग है। उसके शिष्य हजारों होंगे जबकि मेरे सैंकड़ो ही है। आनन्द ने पूछा, ’हम उसे कैसे पहचानें ? बुद्ध ने उत्तर दिया ‘वह मैत्रेय (अर्थात कृपालु) के नाम जाना जायेगा।
आप विचार करें कि गौतम बुद्ध ने भी अपने आपको अन्तिम नही कहा बल्कि बाद के किसी काल में आने वाले मैत्रेय (कृपालु) की भविष्यवाणी की थी। यह और सुन लें कि कुरआन मंे हज़रत मुहम्मद स0 को ‘रहमतुल्लिल आलमीन’ (सभी संसारों के लिए कृपा सुत्रधार) कहा गया है। पारसियों के दूत जरथुस्त्र के विषय में उनके पवित्र ग्रन्थ ‘अवेस्ता’ में लिखा है कि ईश्वर ने कहा, ‘जैसे जरथुस्त्र के मार्ग पर चल कर उसके अनुयायी वैभव की चोटी पर पहंुचे इसी तरह भविष्य में एक समय में ईश्वर को मानने वाली एक जाति होगी जो संसार और उसके धर्मो को एक नया जीवन प्रदान करेगी और जो दूत की सहायता के लिये खतरनाक युद्धों में खड़ी होगी।’ आगे इस दूत का नाम बताते हुए कहा -‘जिसका नाम विजयी स्वेशियान्ट (ैवमेीरलंदज) होगा और जिसका नाम ‘आस्तवत ईरेटा‘ (।ेजअंज म्तमजं) होगा वह स्वेशियान्ट (कृपा) होगा क्योंकि समस्त संसार को उससे लाभ पहंुचेगा और आस्तवत ईरेटा (जगाने वाला) होगा क्योंकि जीवित मनुष्यों के रूप में वह मनुष्यों को उस विनाश के विरूद्ध खड़ा होगा जो मूर्ति पूजकों और मजदानियों की बुराईयों से फैलेगा। (थ्ंतअंकतपद ल्ंेीजए 25.29ए फनवजमक इल ।ण्भ्ण् टपकीलंतजीप पद डवींउउंक पद च्ंतेप ैबतपचजनतमे च्रू18 ।) इस्लाम में अन्तिम दूत की धारणा के अतिरिक्त तमाम धर्मों में केवल जैन धर्म के अनुयायी यह धारणा रखते हैं कि श्री महावीर अन्तिम तीर्थकर थे परन्तु वहां भी यह दावा केवल जैनियों का है, स्वयं श्री महावीर के अपने शब्दों में उनके अन्तिम होने का दावा हमें नही मिलता।
इस्लाम संसार का ऐसा एक मात्र धर्म है जिसको पूर्ण करने वाले हज़रत मुहम्मद स0 ने अन्तिम दूत होने की घोषणा की। आप उन्हें ईश्वर का अन्तिम दूत मानें या न मानें, परन्तु यह हरगिज नही कहा जा सकता कि हर संदेशवाहक ने अन्तिम संदेष्टा होने की घोषणा की थी।
उत्तर- न केवल यह कि इस्लाम के मूल तत्वों के विषय में आपको अभी और अधिक जानकारी की आवश्यकता है, बल्कि अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी आपकी जानकारी में कमी है। खूब समझ लीजिए कि हज़रत मुहम्मद स0 साहब इस्लाम के संस्थापक हरगिज नही थे। उन्होंने पूरे जीवन में कभी यह दावा नही किया कि वह कोई नया धर्म प्रस्तुत कर रहे हैं। कुरआन ने कभी किसी एक स्थान पर भी यह नहीं कहा कि हजरत मुहम्म स0 के द्वारा ईश्वर किसी नये धर्म की स्थापना कर रहा है। पृथ्वी पर इस्लाम धर्म के पहले पैगम्बर हज़रत आदम अ0 थे जो संसार के पहले इन्सान थे। कुरआन की शिक्षा के अनुसार जब-जब संसार में बिगाड़ पैदा हुए और मानव, इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं से हटे तो ईश्वर ने अपने सन्देशवाहक, मार्ग दर्शन हेतु संसार में भेजे। ईश दूतत्व के इसी क्रम में अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 थे जो किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उसी धर्म को जीवित करने हेतु पधारे थे जिसकी शिक्षाओं को लोगों ने बिगाड़ दिया था। इसी प्रकार हजरत ईसा अ0 भी किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उनसे पूर्व जो बिगाड़ आ गया था उसको सुधारने हेतु पधारे। वर्तमान मत्ती की इन्जील (15ः18ः19) इसकी साक्षी है कि हज़रत ईसा अ0 ने तौरेत के अनुसार, जो उनसे पिछला ग्रन्थ था, आचरण करने का आदेश दिया था। बुद्धमत के अनुसार गौतमबुद्ध पहले बुद्ध न थे अर्थात वह भी बुद्धमत के संस्थापक नही थे। श्री महावीर पहले तीर्थकर नही वरन् उनके अनुसार उनका धर्म वही था जो पहले तीर्थकर ऋषभ देव जी का था और वैदिक धर्म का मामला तो बिल्कुल स्पष्ट है। यद्यपि पहले दूत का नाम वहां गुम हो चुका है परन्तु बाद में आने वाले बहुत से व्यक्तियों को हिन्दु धर्म का स्तम्भ माना जाता है। इस प्रकार पहले तो आप यह शंका दूर कर लें कि हर धर्म ने अपने संस्थापक को अन्तिम संदेशवाहक माना है। (असल में संदेशवाक के लिए संस्थापक शब्द ही गलत है। धर्म का संस्थापक ईश्वर है न कि मानव ईशदूत ईश्वरीय धर्म को स्थापित करने के लिये आते थे)।
अब आईये आपत्ति के दूसरे अंश की ओर और वह यह है कि हर धर्म ने अपने किसी संदेश वाहक को अन्तिम माना है आपका यह दावा भी भ्रम पर आधारित है। सबसे पहले वैदिक धर्म को लें -वेदों ने अपने एक महान दूत क ानाम ‘अग्नि’ बताया था, हम अग्नि को दूत (पैगम्बर) चुनते है।’ (़ऋग्वेद 1ः12ः1) 7 जुलाई 1990 के सहकारी युग में डा0 ऋषि चतुर्वेदी ने इस मंत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अग्नि’ इस मंत्र में किसी मनुष्य को नही बल्कि आग को ही अलंकारिक रूप में दूत कहा गया है। ऐसा नही है, बल्कि ऋग्वेद (1ः31ः15) में साफ साफा अग्नि को ‘नर’ अर्थात ‘मनुष्य’ बताया गया है फिर ऋग्वेद (3ः29ः11) में कहा गया है कि अग्नि का नाम ‘नराशंस’ है। वह ‘नराशंस’ नाम से ही संसार मे आयेगा। शब्द ‘नराशंस’ का अनुवाद ‘प्रशंसा’ योग्य मनुष्य अथवा ‘मोहम्मद’ होता है। फिर अथर्ववेद (20ः127ः1) में साफ साफ कह दिया गया कि नराशंस के आने पर उनकी बहुत प्रशंसा होगी, ऊंट उनकी सवारी होगी, उनकी कई पत्नियां होंगी। फिर उस समय के मक्के की जनसंख्या 60,090 होना, अलंकृत भाषा में हब्शा (इथोपिया) देश में शरण लेने वालों की संख्या 100 होना, 10 जन्नती सत्संगिंयों (अशरा मुबश्शिरा) का संकेत, बंदर के युद्ध में विजयी होकर लौटने वालों की संख्या 300 तथा मक्के की विजय के समय इस्लामी सेना की संख्या 10,000 होने का भी वर्णन किया गया है। वेद मन्त्रों का यह अनुवाद प्राचीन अनुवादकों पण्डित राजाराम और पण्डित खेमखरण के अनुवादों पर आधारित है। वर्तमान में चण्दीगढ़ विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर पण्डित वेद प्रकाश उपाध्याय ने यह सारी व्याख्यायें बहुत स्पष्ट शब्दो में लिखी हैं। श्री ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने हमारे इस अनुवाद को अस्वीकार करते हुए अनुवाद लिखा है वह शब्दो का ऐसा वागजाल है जिसका कोई अर्थ नही निकलता। इस प्रकार आप देखें कि दूत ने अपने अवतरण काल कें बहुत बाद नराशंस नाम के एक दूत के आने की भविष्यवाणी की थी और देव लाने वाले अज्ञात ऋषि को अन्तिम नहीं कहा गया था। गीता (4ः7) और श्रीमद् भागवत महापुराण (9ः24ः56) में यह धारणा अंकित है कि जब जब पृथ्वी पर धर्म में बिगाड़ पैदा हो जाता है तथा दुष्कर्म बढ़ जाते है। तब अवतार संसार में आते हैं (पौराणिक काल के ग्रन्थों में दूत के बजाये अवतार की धारणा है)।
यदूदियों की मौजूदा तौरेत और ईसाईयों की वर्तमान इन्जीलों में भी हज़रत मूसा और हज़रत ईसा को अन्तिम दूत नही कहा गया है। दोनांे में स्पष्ट रूप से बाद के किसी काल में आने वाले एक दूत को आने के संकेत दिये गये हैं इन्जील में इसको फारक़लीत (च्ंतंबसमजम व िच्मतपबसलजवे) कहा गया है। जिसका अनुवाद है ‘प्रशंसा योग्य’ अथवा ‘मुहम्मद’। तौरेत व इन्जली के उदाहरण आपने विस्तार से मेरी पुस्तक ‘कितने दूर कितने पास’ में देखें होंगे। इसलिये तफसीलात छोड़ रहा हंू। हालंाकि वेदों के दृष्टांत भी उक्त पुस्तक में हैं परन्तु क्योंकि डा0 ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने इस पर आपत्तियां की थीं अतः संक्षेप में ऊपर उसका पुनरोल्लेख कर दिया है। गौतम बुद्ध ने भी स्वयं को अन्तिम ‘बुद्ध’ नही कहा था। जब बुद्ध के शिष्य ‘आनन्द’ ने प्रश्न किया, ‘आपके जाने के बाद कौन मार्ग-दर्शन करेगा’ ? बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘मैं पृथ्वी पर आने वाला न तो पहला बुद्ध हंू और न अन्तिम हंूगा। अपने समय में पृथ्वी पर एक पहला बुद्ध आयेगा वह पवित्र, अति बुद्धिमानी होगा। शुभ सृष्टि का ज्ञाता, मानव जाति का अद्वितीय नेता, फरिश्तों और अनितय मनुष्यों का गुरू होगा। मैं ने तुम्हें जो सत्य बातें बताई हैं वह तुम्हें बतायेगा। वह ऐसे धर्म का प्रचार करेगा जिसका प्रारम्भ भी उज्जवल होगा। वह ऐसा धार्मिक जीवन व्यतीत करेगा जो पूर्ण व पवित्र होगा, जैसा कि मेरा ढंग है। उसके शिष्य हजारों होंगे जबकि मेरे सैंकड़ो ही है। आनन्द ने पूछा, ’हम उसे कैसे पहचानें ? बुद्ध ने उत्तर दिया ‘वह मैत्रेय (अर्थात कृपालु) के नाम जाना जायेगा।
आप विचार करें कि गौतम बुद्ध ने भी अपने आपको अन्तिम नही कहा बल्कि बाद के किसी काल में आने वाले मैत्रेय (कृपालु) की भविष्यवाणी की थी। यह और सुन लें कि कुरआन मंे हज़रत मुहम्मद स0 को ‘रहमतुल्लिल आलमीन’ (सभी संसारों के लिए कृपा सुत्रधार) कहा गया है। पारसियों के दूत जरथुस्त्र के विषय में उनके पवित्र ग्रन्थ ‘अवेस्ता’ में लिखा है कि ईश्वर ने कहा, ‘जैसे जरथुस्त्र के मार्ग पर चल कर उसके अनुयायी वैभव की चोटी पर पहंुचे इसी तरह भविष्य में एक समय में ईश्वर को मानने वाली एक जाति होगी जो संसार और उसके धर्मो को एक नया जीवन प्रदान करेगी और जो दूत की सहायता के लिये खतरनाक युद्धों में खड़ी होगी।’ आगे इस दूत का नाम बताते हुए कहा -‘जिसका नाम विजयी स्वेशियान्ट (ैवमेीरलंदज) होगा और जिसका नाम ‘आस्तवत ईरेटा‘ (।ेजअंज म्तमजं) होगा वह स्वेशियान्ट (कृपा) होगा क्योंकि समस्त संसार को उससे लाभ पहंुचेगा और आस्तवत ईरेटा (जगाने वाला) होगा क्योंकि जीवित मनुष्यों के रूप में वह मनुष्यों को उस विनाश के विरूद्ध खड़ा होगा जो मूर्ति पूजकों और मजदानियों की बुराईयों से फैलेगा। (थ्ंतअंकतपद ल्ंेीजए 25.29ए फनवजमक इल ।ण्भ्ण् टपकीलंतजीप पद डवींउउंक पद च्ंतेप ैबतपचजनतमे च्रू18 ।) इस्लाम में अन्तिम दूत की धारणा के अतिरिक्त तमाम धर्मों में केवल जैन धर्म के अनुयायी यह धारणा रखते हैं कि श्री महावीर अन्तिम तीर्थकर थे परन्तु वहां भी यह दावा केवल जैनियों का है, स्वयं श्री महावीर के अपने शब्दों में उनके अन्तिम होने का दावा हमें नही मिलता।
इस्लाम संसार का ऐसा एक मात्र धर्म है जिसको पूर्ण करने वाले हज़रत मुहम्मद स0 ने अन्तिम दूत होने की घोषणा की। आप उन्हें ईश्वर का अन्तिम दूत मानें या न मानें, परन्तु यह हरगिज नही कहा जा सकता कि हर संदेशवाहक ने अन्तिम संदेष्टा होने की घोषणा की थी।
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